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Wednesday, July 7, 2010

सुनहरी यादें...अचलगंज की ! (पार्ट- 1)


बचपन की यादों को लेकर हरेक व्यक्ति बहुत उत्साहित रहता है.....हरेक को अपना बचपन बहुत याद आता है. हम जैसे भावनात्मक व्यक्ति के लिए तो बचपन की यादें "नोस्टाल्जिया" टाईप माहौल क्रियेट करती हैं. सुनहरी यादें विशेषांक के लिए बहुत दिनों से लिखना चाहता था मगर जाती मसरूफियत ने चैन लगने नहीं दिया....इधर कुछ वक्त मिला तो ब्लॉग पर कुछ पुरानी यादें लिखने का जी हो गया . मैं इस क्रम में खुद से और परिवार से जुडी अचलगंज, बांगरमऊ और लखीमपुर खीरी से जुडी घटनाओं को स्मृति में लेन और की-बोर्ड के सहारे आप तक पहुँचाने की कोशिश करूंगा...इस अंक में शुरुआत करते हैं अचलगंज से जुडी यादों को आप तक पहुँचाने से......!


हमारी बहुत सी यादें अचलगंज कस्बे से जुड़ी हुई हैं। यह कस्बा उन्नाव जनपद में आता है। उन्नाव-रायबरेली मार्ग पर उन्नाव से 15 किमी0 दूरी पर अचलगंज कस्बा पड़ता है। बहुत ठीक से तो कुछ नहीं कहा जा सकता किन्तु मेरी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा इसी कस्बे से आरम्भ हुई। वैसे इससे पूर्व ही मैं आगरा तथा उसके बाद ननिहाल मेदेपुर में स्कूल जाने की शुरूआत कर चुका था, किन्तु इन दोनों स्थानों की स्मृतियां अत्यन्त धूमिल हैं।


फिर से आते है अचलगंज पर। इस कस्बे में पापा की पहली पोस्टिंग हुई। घर किराये पर लिया गया। मुहल्ला याद नहीं। मेरा ऐडमीशन पं0 अवध बिहारी मान्टेसरी स्कूल में कराया गया। स्कूल के प्रबन्धक व प्रधानाचार्य श्री कमल पाण्डेय थे। मैंने इस स्कूल में सम्भवतः कक्षा 1 या कक्षा 2 में प्रवेश लिया था। पंकज और जौनी ने अभी स्कूल जाना शुरू नही किया था। इस जगह हम लोग लगभग 1 साल तक रहे। इस उम्र में उपलब्धियां तो खैर क्या हो सकती थीं, बस इतना याद है कि कुछ दोस्त जिन्दगी में आये जैसे- अर्चना, जुनैद बाकी मुझे याद नही। अर्चना के साथ मैं स्कूल जाया करता था उसके पिता शायद खण्ड विकास अधिकारी या सहायक खण्ड विकास अधिकारी हुआ करते थे। अर्चना अपने छोटे भाई को लेकर मेरे घर आती थी। मैं और पंकज उनके साथ घंटों खेला करते। यही कुछ संक्षिप्त स्मृतियां अचलगंज के पहले चरण की याद है, जिन्हें मैं लिख पा रहा हूँ।


अचलगंज के बाद कुछ वर्षो के लिए हम बॉगरमऊ चले गए। बॉगरमऊ भी उन्नाव का एक बहुत बड़ा कस्बा है। संयोग था कि बॉगरमऊ में 2-3 साल गुजारने के बाद पापा का स्थानान्तरण पुनः अचलगंज हो गया। हम पुनः अचलगंज आ गए।


अचलगंज का यह दूसरा चरण मेरी जिन्दगी और मेरे परिवार के लिए बहुत महत्वपूर्ण रहा। मुझमें यहीं से कुछ समझदारी विकसित हुई। अब मैं कक्षा 6में आ चुका था........दाखिला पुनः पं0 अवध बिहारी जू0हा0 में लिया गया, लेकिन इस बार परिस्थितियां भिन्न थीं, दाखिला सिर्फ मेरा ही नही पंकज का भी हुआ था...............सो स्कूल में यारी-दोस्ती का सिलसिला बढ़ा। यहां जो मित्र बने उसकी सूची काफी लम्बी हो सकती है जैसे- पिन्टू (टी.टी.), अतुल, राजा भईया, कमल, मंगू, प्रदीप, तूते, परमेश्वर, कम्बोध, ललित............आदि। पंकज के मित्रों की फेहरिस्त में अमित , चंदन आदि शामिल हुए। नए अध्यापकों का जीवन में आगमन हुआ जैसे- रामसजीवन सर, सूर्य कुमार सर, दीक्षित सर, वीरेन्द्र सिंह सर.........और भी कई। नए कुछ लोग हमारे परिवार से जुड़े जिनसे अबतक रिश्ता जारी हैं जैसे- शान्ति आन्टी, एस0डी0 शर्मा अंकल...........।


अचलगंज के दूसरे चरण में हम लोग श्री रामदास गुप्ता के मकान में किराये पर रहे। दरअसल पापा पुलिस की नौकरी में थे और वे इस बात के पक्षधर थे कि परिवार को पुलिसिया वातावरण से जितना दूर रखा जाय उतना ही बेहतर है। इसी सिद्धांत का पालन करते हुए उन्होंने सरकारी पुलिस क्वार्टर्स में मकान एलॉट न करवाकर किराये पर लेना ज्यादा उचित समझा। उनका ये सिद्धान्त व्यवहारिक रूप से उचित ही था। इस मकान में आने के बाद आस-पास के बच्चों से हमारी दोस्ती होने लगी। मैं और पंकज स्कूल भी जाने लगे थे। मैं कक्षा 6 या 7 में था और पंकज 3 या 4 में। दोस्तों के बनने का सिलसिला शुरू हुआ। उन दिनों मुहल्ले के बच्चे क्रिकेट खेला करते थे, यहीं से हमें भी क्रिकेट का शौक लगा। हमारे मुहल्ले में ही उन दिनों टीटी नाम का एक लड़का हुआ करता था, जिसका सही नाम पिन्टू था। टीटी क्रिकेट का अच्छा खिलाड़ी था और न केवल वह खेलने में अच्छा था बल्कि खेल के बारे में उसकी जानकारी भी अद्भुत थी। उम्र में वह मुझसे बमुश्किल 3 या 4 साल बड़ा था किन्तु उसकी जानकारी के विषय में आज भी सोचता हूँ तो आश्चर्य होता है। 1986 के आस-पास का वक्त था, उसे आठों क्रिकेट टीमों के बारे में (उन दिनों क्रिकेट में मात्र 8 देश ही खेलते थे) उनके खिलाड़ियों के रिकार्ड के बारे में टीटी को जबरदस्त जानकारी थी। वह अपनी खेल की जानकारियों से हमें भी अवगत कराता था। अखबार पढ़ते समय टीटी अखबार को कभी पहले पन्ने से नही पढ़ता था। वह हमेशा अखबार को अंतिम पन्ने से पढ़ना शुरू करता था, क्योंकि उन दिनों खेलों की खबरें अखबारों के अंतिम पन्ने पर हुआ करती थीं। टीटी ने हमें कॉमिक्स, डाइजेस्ट, कहानियों की किताबें देना शुरू किया इसके बाद तो स्थिति यह थी कि मैं और पंकज कॉमिक्स के बहुत बड़े दीवाने हो गये। टीटी के अलावा राजा भईया, अतुल गुप्ता, तूते, बल्लू, मंगू, अमित गुप्ता जैसे खिलाड़ी भी उन दिनों उस मुहल्ले की गलियों में क्रिकेट खेलते थे। हम दोनों भाई भी उसी गली की टीम में शामिल हो गये और उसके बाद क्रिकेट का जो शौक लगा वो आज तक कायम है। जू0हा0 की परीक्षा के बाद जब मेरा दाखिला इन्टर कालेज में हुआ तो वहां भी क्रिकेट खेलने वाले कुछ साथी मिल गए। उन साथियों में हरिओम और ललित मिश्रा शामिल थे। इन दोनों खिलाड़ियों के साथ मैं अपने कालेज के पास वाले ‘लोहचा ग्राउण्ड’ पर क्रिकेट खेलने जाता था। 1987 में रिलायन्स कप के दौरान हमने टी0वी0 पर क्रिकेट देखने के बाद क्रिकेट की कुछ बारीकियां भी सीखने का प्रयास किया।


अचलगंज की यादों में फिल्मों को देखने का शौक भी शामिल किया जा सकता है। यह वह दौर था कि जब वीडियो का फैशन शुरू हो चुका था। लोग चन्दा एकत्र करके वीडियो मंगाते थे और रात भर वीडियो पर 3-4 फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता था। मुहल्लेवासी रातभर जागरण करते हुए अपनी नींद को नियंित्रत करते हुए उन फिल्मों को देखते थे। खुले आसमान के नीचे किसी खुली जगह पर वीडियो रखा जाता था और दर्शक जम जाते थे। किन फिल्मों का प्रदर्शन किया जायेगा यह राज तभी खुलता था जब वीडियो प्लेयर में वीडियो कैसेट डाल दी जाती थी और कुछ जद्दोजहद के बाद प्रिंट के सही होने की घोषणा की जाती थी और फिल्म शुरू हो जाती है। हम लोग आपस में दिनभर यह कयास लगाया करते थे कि आज रात में कौन सी पिक्चर वीडियो पर दिखायी जायेगी बहरहाल पापा के भय के कारण हम लोग बहुत कम जगहों पर वीडियो पर फिल्म देखने जा पाते थे। इतना याद है कि आरम्भिक दौर में हमने जो फिल्में देखी उनमें प्यार झुकता नही , मि0 इण्डिया, प्रतिघात, लोहा, हुकूमत, नगीना, शराबी जैसी फिल्में थीं, उस दौर में कुछ पुरानी फिल्मों को भी वीडियो पर देखने का शौक था जैसे- धूल का फूल, दो बदन आदि। लेकिन हम बच्चों को उन दिनों जितेन्द्र, मिथुन, धर्मेन्द्र, अमिताभ जैसे वही हीरो पसन्द आते थे, जो सिर्फ हिंसात्मक फिल्मों के हीरो होते थे। ‘नदिया के पार’ भी उन दिनों की एक लोकप्रिय फिल्म थी, जिसका प्रदर्शन आये दिन होता रहता था। उन्नाव के फिल्म हाल में जाना एक बड़ी उपलब्धि थी। कक्षा 9 तक आते-आते मैनें मात्र 2 फिल्में ही उन्नाव के सिनेमा हॉल में देखी थी, एक थी ‘बाबुल’ और दूसरी थी ‘मुद्दत’। इसी बीच कभी कभार गर्मियों की छुट्टियों में गुरूदेव प्रमोदरत्न का भी अवतरण अचलगंज की धरा पर हो जाता था। गुरूदेव की जानकारी को हम लोग ‘एैब्सल्यूूट नालेज’ माना करते थे। वे हमें नई-नई जानकारियां दिया करते थे। उनके द्वारा बताया गया कि एक हीरो ऋषिकपूर भी है, जिसकी ऐक्टिंग इन सब हीरो के मुकाबले कहीं ज्यादा अच्छी है। हम दोनो भाईयों के दिमाग में यह बात घर कर गई और इसको सिद्ध करने के लिए हमने आगामी कुछ समय में प्रेम रोग, नसीब और अमर अकबर ऐन्थोनी जैसी फिल्में भी देखी।


उन दिनों किसी भी घर में टी0वी होना उस घर की सम्पन्नता और विकसित सोच का प्रतीक हुआ करता था। हमारे घर में टी0वी0 नही था। मजबूरी में हमें दूसरों के घर जाकर पोर्टेबल टी0वी0 के सामने बैठकर रामायण, हम लोग, चित्रहार, बुनियाद जैसे कार्यक्रमों का आनन्द उठाते थे। हमारे टी0वी0 देखने के शौक ने माँ-पापा को इस बात पर विचार करने के लिए विवश किया कि क्यों न एक नया टी0वी0 खरीद लिया जाय। टी0वी0 खरीदने के विषय पर उन दिनों कई भ्रान्तियां हुआ करती थीं। हमारे स्कूल के प्रधानाचार्य जी ने पापा को एक टूक राय दी कि ‘‘साहब बच्चों को बर्बाद करना है तो ही टी0वी0 लाईये’’ पापा के ही एक संगी ने यह भी अनमोल राय दी ‘‘आँखे खराब करनी है, तो ये बीमारी घर में लाईये।’’ बहरहाल इन दो सुझावों के बाद घर में टी0वी0 आने का प्रस्ताव कुछ दिनों के लिए टल गया। लेकिन शान्ति आन्टी (जो हमारे परिवार से बहुत नजदीकी से जुड़ चुकी थी) जो काफी प्रोग्रेसिव सोच की थीं, उन्होंने इन अवधारणाओं का खण्डन किया और चुनौती पेश की कि बच्चों की जानकारी बढ़ाने के लिए टी0वी0 बहुत जरूरी माध्यम है। मम्मी ने भी उनकी बात का समर्थन किया और 1986 के किसी महीने में हमारे घर टी0वी0 आ गई। यह टी0वी0 बुश कम्पनी की थी। इस टी0वी0 के बारे में शान्ति आन्टी और मम्मी का यह मानना था कि यह टी0वी0 उस समय की सबसे मंहगी और सबसे बेहतरीन टी0वी0 थी। सीरियल्स का ज़माना था, प्रत्येक रविवार हम मेजबान की तरह सुबह से जुट जाते थे और मुहल्लेवासी हमारे यहां बैठकर रामायण से लेकर देर रात तक टी0वी0 कार्यक्रमों को आनन्द उठाते थे। कई कार्यक्रम तो ऐसे थे जो हमारी समझ से बिल्कुल बाहर थे, लेकिन फिर भी हम उन्हें पर्याप्त रूचि से देखते थे। ऐसे कार्यक्रमों मेें अंग्रेजी के समाचार, फोकस, कृषि-दर्शन, साहित्यिक व्यक्तित्वों के साक्षात्कार शामिल थे और मजे की बात यह थी कि ये सारे कार्यक्रम हमारे साथ अम्मा भी देखती थीं।


क्रमश:


*****PK

7 comments:

pankaj said...

पूज्य भैया ....
वह भी क्या दिन थे ! ... थोडा है... थोड़े की जरुरत है ... इस फ़लसफ़े के साथ भरपूर बचपन हमने जिया ...हर पल का आनंद लिया ... और छोटे - बड़े सभी से जो मिला सीखा ... आप के साथ बचपन से ही हर मुश्किल से धैर्य से मुकाबला करना सीखा ... आज भी उसी पूंजी के बल पर जी रहा हूँ ! सोचता हूँ कि आप में पच्चीस बरस पहले भी वही परिपक्वता सूझबूझ थी ... जितनी आज ! सच यही है कि आप के बिना मैं अपने अस्तित्व के विषय में भी नहीं सोच सकता !

amit said...

Bhaiya ji paay chhuye,

Maja aa gya kya bat hai, apka to wakai mai koi jbab nhi,sari bate apko bariki se yad hai,aur ha ek request hai ki aage ki jeevni jaldi hi post kijiyega.apne to ekta kapoor ki tarh suspense creat kar diya,par hm kr bi kya skte hai instalment mai hi pdenge. Exam ki wyastta k karan net pe nhi aa pa raha hu,
aur ek bat puchhni thi ki jb aap wapas achalganj phuche tb apki mulakat archana se nhi hui kya,apne unka to jikr kiya hi nhi.agli post mai jbab dijiyega,
bye bhaiya charan sparsh
Chintoo

amit said...

Sorry bhaiya ji wo na mobile se comment bheja hai isliye ek galti ho gyi,
ARCHANA JIIIIIIIIIIIII


Chintoo

psingh said...

आदरणीय भैया
आप ने तो बखूबी यादों के उन लम्हों को संजो कर रखा है
पोस्ट पढ़ कर आपका पूरा बचपन आँखों के सामने से घूम गया |
मेरा प्रणाम स्वीकारें ........

सत्यम न्यूज़ said...

भैया.....मजा आगया...अचलगंज की याद ताज़ा कर दीं.विषेशुर....कमल....बी डी ओ...शर्मा जी..अपने घर के ठीक नीचे महावीर....ओफ्फो कितनी यादें हैं इनसे....फोकस प्रोग्राम को बीडीओ खूब देखते थे..महावीर...उनका लड़का सोनू...जब हम और पंकज भैया बेसन के लड्डू खाते थे तो मुह खोल के समने ही खड़ा रहता था....अचलगंज में प्रचलित किवदंतियां....नीलकंठ को देखने जाना....तूते....मंगू....सब ताज़ा कर दिया भईया.....बहुत खूब....

ShyamKant said...

वाह भैय्या कितनी सुन्दर यादें ..........................
मज़ा आ गया बहुत प्यारी यादें हैं हमारी .........
हालाँकि मुझे कुछ भी याद नहीं है ................
पर टी.टी. का क्या हुआ ........................
हमारी प्रगति में टी.टी. का बहुत बड़ा हाँथ है............

Rajaram Mishra said...

पुरानी यादें
वाह!!! अपने गांव का नाम देखा तो हमारी यादें भी अतित की पुरानी फिल्म की तरह एक एक चित्र सामने आने लगा |
अचलगंज में एक प्रराईमरी पाठशाला, एक कन्या विध्यालय था | आज का आदर्श कालेज आदर्श विध्यालय था | 10वी तक पढाई होती थी वह् भी केवल आर्ट साईड से | बात 1970 के आस् पास की है, हम अपने जिले में खेल-कूद में अपने विध्यालय का प्रतिनित्व करतें थे | ब्लॉक लेवल पर तो हम 100 मीटर 200 मीटर और हाई जम्प के चैंपियन थे | और पीछे याद करे तो, ब्लॉक ऑ़फिस का उद्घाटन भी तो हम शामिल हुए थे उस दिन विध्यालय से छुटाटी मिलीं थी | मुख्यमंत्री हेमवती बहुगुणा जी का हेलिकाप्टर ब्लाक के पीछे वाले खेत में उतर गया था | और वह् पीछे से भागते हुए आए थे | हमारे गाँव में बड़े बड़े नेता आए थे | एक बार जब मिशेज इंदिरा गाँधी जब गाँव से होकर रायबरेली जा रही थी ,हमारा तख्त उनको बैठने को दिया गया था वह् तख्त आज भी उनकी याद में सुरक्षित है | इमेर्जैन्सी में काँग्रेस का विरोध पूरा गाँव कर रहा था शम्भू हलवाई की दुकान के ऊपर ऑ़फिस से जनता दल का प्रचार सब याद है| अचलगंज रेलवे स्टेशन सबसे सुंदर रेल्वे स्टेशन माना जाता था | स्टेशन मास्टर और अन्य स्टाफ के लिए क्वार्टर बने थे | रामेश्वर बाबा का मन्दिर तो पूरे क्षेत्र में प्रशिध है पर उस समय राजा का कुवाँ जैसा कुवाँ पूरे जिले में नही था जिसमें सोने के घडे होने कि बात पुराने लोग कहते थे | भदई का मेला, रामलीला पूरे क्षेत्र में प्रशिध था | होली मे बबुवा हलवाई और मून काने का हुड्दंग देखने लायक होता था | मून काने का शुर्पणखा का पाठ मनोरंजन पूर्ण होता था | दुल्लू दीक्षित और उनके भाई का राम और लक्ष्मण का पाठ प्रसंशनीय था | उस समय रजनू हलवाई की चाट बहुत बिकती थी | और पीछे याद करे, अचलगंज की बाज़ार पहले चौराहे के पास पुरवा वाली सड्क पर लगती थी | रामलाल चुंगी वसूल करते थे |
और फिर कभी.....
जब तक गंगा जमुना जल धारा...
अ‍चल रहे यह गाँव हमारा....

राजाराम मिश्र,मुम्बई