Total Pageviews

Tuesday, July 20, 2010

लखीमपुर खीरी....खंडित यादें !


अचलगंज की मोहक यादों के बाद सफ़र का अगला पड़ाव लखीमपुर खीरी रहा....यहाँ हम एक साल ही रहे। इस एक बरस की यादों का टूटा-फूटा लेखा-जोखा पेश कर रहा हूँ ......!


1988 में हम लखीमपुर खीरी आ गए... ! अचलगंज छोड़ते वक्त बहुत दुःख हुआ....ऐसा लगा कि इस जगह को छोड़ने के बाद हम कहीं और इतना आनंद नहीं उठा पाएंगे मगर वक्त कहाँ टिकता है....?

यहाँ धर्मसभा कालेज में मैंने एडमीसन लिया....पंकज और जोनी का कुंवर खुस्वक्त राय स्कूल में एडमीसन हुआ। हम लोग एक वकील साहब के मकान में किराये पर रहने लगे..... वकील साहब कुछ तुनकमिजाज थे सो हमारे परिवार के साथ उनके साथ रिश्ते बहुत भावनात्मक नहीं हो सके, वकील साहब कि दो पत्नियाँ थी। वकील साहब का एक पुत्र टीटू था जो हम उम्र था....उसके साथ जरूर ठीक-ठाक याराना रहा. यहाँ हमने क्रिकेट खूब खेला.


अचलगंज से पत्रिकाएं-कोमिक्स पढ़ने का जो शौक लगा था...वो लखीमपुर में परवान चढ़ा। रेलवे स्टेशन पर ए.एच. व्हीलर की दुकान से हम लोग नियमित तौर पर पत्रिकाएं-कोमिक्स खरीदते और पढ़ते. बालहंस नमक नयी पत्रिका उन दिनों प्रकाशित होना शुरू हुयी थी, मैं और पंकज उस पत्रिका के नियमित पाठक हो गए थे......नन्हे सम्राट भी उन्ही दिनों प्रकाशित होना शुरू हुयी सो उसे भी हम लोग पढ़ते थे...बाकी नंदन, पराग, चंदामामा, डायमंड कमिक्सेस के तो हम पुराने मुरीद थे ही. दैनिक जागरण में उन दिनों अंतिम पृष्ठ पर हर दिन नए तरीके के रंगीन परिशिष्ट आने लगे थे...शनिवार को बच्चों का पन्ना प्रकाशित होता था....उसमें पहेली भी आया करती थी, हम दोनों भाई उनके हल पोस्ट किया करते थे....मगर उन दिनों तक हम कोई प्रतियोगिता जीत नहीं सके थे.



लखीमपुर में हमने एक साल में तीन मकान बदले.....पहले जिस मकान में रहे वो किसी वकील साहब का था.....वकील साहब के साथ हमारे परिवार से राब्ता बहुत दिन तक न चल सका....कारण तो मुझे याद नहीं....मगर जल्दी ही हमने उस मकान को छोड़ दिया....! नए मकान में शिफ्ट हो गए....यह मकान छोटा था....सो इसे भी जल्दी छोड़ दिया. बमुश्किल एक-दो महीने ही इस मकान में हमने गुज़ारे होंगे. इस मकान में हम संभवत: नवम्बर- दिसंबर में रहे थे....! प्रमोद भैया इस मकान में आये थे....यह वो समय था जब टीवी पर हिंदी सिनेमा के लीजेंड डाइरेकटर्स की फिल्मों का 15 दिवसीय कोई कार्यक्रम चल रहा था.....हर दिन रात राजकपूर-गुरुदत्त-बिमल रॉय जैसे बड़े निर्देशकों की फिल्मों का प्रदर्शन डीडी पर किया जाता था.....हम सब ने मिलकर उन दिनों आवारा, जिस देश में गंगा बहती है, श्री 420, आह, दिल अपना और प्रीत पराई जैसी फ़िल्में देखी. प्रमोद भैया के साथ पिक्चर देखने का आनंद उन दिनों कुछ और ही हुआ करता था. इस मकान के बाद हम रामलीला मैदान की तरफ हम नए मकान में शिफ्ट हुए. यह मकान अच्छा था......यहाँ हम लोग तीन-चार महीने रहे. पापा के लगातार ट्रांसफर और हमारी पढ़ाई को देखते हुए पापा-मम्मी ने मैनपुरी शिफ्ट होने का निर्णय लिया.

दोस्तों की फेहरिश्त यहाँ बहुत ज्यादा नहीं रही....कुछ क्लासमेट जरूर दोस्त बने जो बहुत स्वाभाविक भी था...मगर इस शहर से ऐसा कोई रिश्ता नहीं जुड़ा जो बहुत दिल को छुआ हो....विजय पाठक और दिनेश खरे ये दो नाम ज़रूर मुझे याद आ रहे हैं जिनसे कालेज के दौरान अच्छा जुड़ाव रहा. विजय पाठक पंजाबी कोलोनी में रहते थे.....सो वे तुलनात्मक रूप से कुछ मोडर्न विचारधारा के थे.....सूप-सैंडविच जैसे फास्ट फ़ूड के जानकार थे, ब्रेक डांस उन्हें बहुत अच्छा लगता था, सो मिथुन-गोविंदा-जावेद जाफरी उनके प्रिय कलाकार थे. मेरी बुद्धि तब तक बहुत ज्यादा दुनियावी नहीं हो पाई थी. दिनेश खरे कालेज के ही बड़े बाबू के सुपुत्र थे...वे मोडर्न नहीं थे...मगर पढ़ने में मेहनती थे. दिनेश खरे त्रिगोनोमेट्री आदि में ठीक-ठाक थे...! उन्ही दिनों एक- दो नए दोस्त भी बने लेकिन उन नामों को अब याद नहीं कर पा रहा हूँ ....शायद आनंद अवस्थी भी उनमे से कोई एक था.


बहरहाल लखीमपुर से क्लास 10 किया सो एक साल में इससे ज्यादा यारानों की उम्मीद भी नहीं की जा सकती....!



दो चीजें जरूर ऐसी थीं जिनके लिए लखीमपुर हमेशा याद रहेगा .



पहला- आइवर युशियेल की एक किताब "साईंस एक्सपेरिमेंट्स" मैंने यहाँ खरीदी जिसके बाद मैंने कई प्रयोग किये... और इस किताब ने मुझे एक ''साइंटिस्ट" बनने के लिए प्रेरित किया...मगर यह बुखार बहुत जल्दी उतर गया, जब पापा ने कहा पहले हाई स्कूल पास कर लो तब कुछ और सोचना ........ मुझे तब लगा था कि 'एक साइंटिस्ट बहुत जल्दी मर गया'......! वैसे इन्ही दिनों मैंने स्कूल स्तर पर विज्ञान मेला में भाग लिया और साइंस का कोई माडल अपने दोस्तों के माध्यम से बना कर 'डेमो' किया।



दूसरा- यहाँ आकर मुझे स्कूल-ट्यूशन आदि पैदल जाना पड़ता था...सो एक साइकिल पापा ने नयी खरीदी ... नीले रंग की इस साइकिल ने मेरे जीवन में जैसे रंग भर दिए ...अब मुझे लगता था कि इस साइकिल से मैं दुनिया के किसी भी कोने का चक्कर लगा सकता हूँ....! साइकिल को साफ़ करना उसे चमचमाता हुआ रखना अब मेरी दिनचर्या के अभिन्न अंग थे....कभी -कभी यह साइकिल पंकज भी चला लिया करते थे...!
क्रमश:
*****PK

4 comments:

सत्यम न्यूज़ said...

सुनहरी यादों का मुझे इंतजार रहता है....और हर इंतजार का फल पहले वाले से ज्यादा मीठा लगता है मुझे आपका ''साइंटिस्ट'' वाला किस्सा बेहद पसंद आया...आपको याद हो में तो छोटा था....उन दिनों ओलंपिक शुरू हो गए थे,,,हम सब लोग सुबह चार बजे उठ कर लाइव देखा करते थे....पापा ओयेल थाने में इंचार्ज थे....पंकज भैया के साथ वहाँ जाना...सब कुछ ताज़ा कर दिया....

psingh said...
This comment has been removed by the author.
psingh said...

bhaiya
ye part bhi hit hai
maja agya
vo saikil mujhe aj bhi yad hai
apke sath usi nili saikil par baith kar mene mainpuri ghuma hai
dil ko chu liya apne
pranam swikaren

Ranjit said...

pawan bhayia apki jindgi ki kuch kate meti yaadin ke bare me jankar bahut aacha laga. ur biograhpy is very intersting.