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Wednesday, April 6, 2011

मैनपुरी मुशायरे की पूर्व संध्या.....! (PART-1)



मैनपुरी की ऐतिहासिक श्रीदेवी मेला एवं ग्राम सुधार प्रदर्शनी २०११ शुरू हो चुकी है.... इस नुमाइश में कादंबरी मंच पर हमेशा से बेहतरीन साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते रहे है. गत वर्ष से अपने हृदेश भी इस समिति में संयोजक मंडल में शामिल किये जा चुके हैं. गत वर्ष उन्होंने युवा महोत्सव का शानदार संयोजन किया था, संभवत: उनकी मेहनत और उनकी जीवटता को मद्देनज़र रखते हुए इस बार उन्हें आल इण्डिया मुशायरे की कमान सौंपी गयी गयी है.... ! इस बार के मुशायरे में जो शायर जुट रहे हैं वे सारे के सारे अव्वल दर्जे के शायर हैं, सोचा की मुशायरे से पूर्व इन सब हुनरमंदों से आप सबका राब्ता करा दूं..... दो-तीन कड़ियों की इस पोस्ट का पहला अंक आज पेश कर रहा हूँ।


इस मुशायरे की जान होंगी मोहतरमा इशरत आफरीन......! वे इस मुशायरे को इंटरनेशनल दर्ज़ा दिलाएंगी क्योंकि मोहतरमा पाकिस्तान की हैं और फिलहाल अमेरिका में शिफ्ट हो चुकी हैं.....! हमारी खुशकिस्मती होगी उन्हें सुनना. मोहतरमा इशरत आफरीन का नाम उर्दू अरब में बडी इज्ज़त के साथ लिया जाता है. वे मूलतः पाकिस्तानी हैं जो एक भारतीय वकील जनाब़ सैयद परवेज से विवाह करने के बाद अमेरिका में हयूस्टन टेक्सास में बस गयीं. मोहतरमा इशरत आफरीन उर्दू-अदब की उन नामचीन शायराओं में से एक हैं जिन्होने ‘‘नारीवादी आन्दोलन‘‘ को चलाने में मजबूत भूमिका निभाई है. अदा ज़ाफरी, जोहरा निगाह, फहमीदा रियाज़, किश्वर नाहीद, परवीन शाकिर की श्रृंखला में मोहतरमा इशरत आफरीन का नाम बड़े अदब के साथ शामिल किया जाता है. मोहतरमा आफरीन के दो गज़ल संग्रह ‘कुंज पीले फूलों का‘ (1985) तथा ‘धूप अपने हिस्से की‘ (2005) प्रकाशित हो चुके हैं. मुझे याद आ रहा है कि जगजीत सिंह ने मोहतरमा की एक गज़ल गाई है जो बहुत पॉपुलर हुयी.....

अपनी आग को जिन्दा रखना कितना मुश्किल है,

पत्थर बीच आईना रखना कितना मुश्किल है !!


चुल्लू में हो दर्द का दरिया ध्यान में उसके होंठ,

यू भी खुद को प्यासा रखना कितना मुश्किल है !!

आज कल मोहतरमा आफरीन टेक्सास यूनीवर्सिटी में उर्दू की हेड आफ डिपार्टमेण्ट हैं। भारत में उनका आगमन, और वो भी मैनपुरी मुशायरे में हमारे लिए शान की बात होगी। हम तो बस यही कहेंगे कि मोहतरमा इशरत आफरीन अपने नाम के मुताबिक ‘उपलब्धि की सकारात्मक प्रतिक्रिया‘ ही साबित होंगी.

अब चलते हैं मंच के अगले नामवर शायरों की जानिब.....! इधर कुछ समय से जिन युवा गज़लकारों ने बडी मजबूती से अपनी कलम से अपने होने का एहसास कराया है उनमें से ‘आलोक श्रीवास्तव‘ एक बडा नाम है। आलोक मेरे मित्र हैं और सच तो यह है कि मुझे फक्र है कि आलोक मेरे मित्र हैं. आलोक को उनके शानदार लेखन के लिए हाल ही में रूस का साहित्यिक ‘पुश्किन ‘ अवार्ड मिला है. युवावस्था में ही इस शायर की कृति ‘आमीन‘ धूम मचा चुकी है. गज़ल गायक जगजीत सिंह और शुभा मुदगल ने यदि इस युवा शायर की ग़ज़लें गाई है तो उसका चुनाव कहीं से गलत नहीं है. मध्यप्रदेश के सांस्कृतिक नगर विदिशा में आलोक श्रीवास्तव का बचपन गुज़रा और वहीं से आपने हिंदी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा ग्रहण की. बाद में वे पत्रकारिता से जुड़ गए. बेहद बारीक़ अहसासात को स्पर्श करती हुई आपकी ग़ज़लियात अपनी संवेदनाओं के लिये जानी जाती हैं. सलीक़े से कही गई कड़वी बातें भी आपकी रचनाधर्मिता की उंगली पकड़ कर अदब की महफ़िल में आ खड़ी होती हैं. जगजीत सिंह और शुभा मुद्गल जैसे फ़नक़ारों ने आपकी ग़ज़लियात को स्वर दिया है. इन दिनों आप दिल्ली में एक समाचार चैनल में कार्यरत हैं. यदि पुरस्कारों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान 2002′; ‘मप्र साहित्य अकादमी का दुष्यंत कुमार पुरस्कार-2007′; ‘भगवशरण चतुर्वेदी सम्मान 2008′; ‘परंपरा ऋतुराज सम्मान-2009′ और ‘विनोबा भावे पत्रकारिता सम्मान-2009′ आपके खाते में अभी तक आते हैं. कल ही वे अपनी नयी ग़ज़ल मुझे फ़ोन पर सुनकर एहसासों से तर बतर कर रहे थे.....फिलहाल मैं यहाँ उनकी उस ग़ज़ल को पोस्ट जकर रहा हूँ जिसने मुझे उनका मुरीद बना दिया.... मुलाहिजा फरमाएं -

चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नज़र पर छाई अम्मा

सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा !!

घर के झीने रिश्ते मैंने लाखों बार उधड़ते देखे

चुपके -चुपके कर देती है, जाने कब तुरपाई अम्मा !!

सारे रिश्ते- जेठ-दुपहरी, गर्म-हवा, आतिश, अंगारे,

झरना, दरिया, झील, समन्दर, भीनी-सी पुरवाई अम्मा !!

बाबूजी गुज़रे आपस में सब चीज़ें तक्सीम हुईं,

तो-मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा !!


अब ज़रा आगे बढ़ते हैं....... आलोक श्रीवास्तव की ही उम्र के ही एक और शायर से तआर्रुफ़ करा रहा हूँ नाम है मदन मोहन 'दानिश'......वे सिर्फ नाम के ही नहीं वाकई 'दानिश' हैं। दानिश भी उन नौजवान शायरों में से हैं जिनकी शायरी उनकी उम्र से बड़ी लगती है।यदि उनके बारे में अगर आपको पता न हो तो उनकी शायरी पढने-सुनाने के बाद यही महसूस करेंफ्गे की दानिश ज़रूर ही कोई बुजुर्ग शायर होंगे. उनके बारे में राहत इन्दौरी जैसे नामचीन शायर अगर यह कहते हैं कि "शायरी पुलसरात पर नहीं तो कम अज़ कम रस्सिओं पर चलने का अमल ज़रूर है. आसमानों को पढ़ना, ख़लाओं को सुनना और मौत को जीने का हुनर है. बीसवीं सदी की आखिरी दहाई में जिन चंद नौजवानों ने मुझे मुतवज्जा किया उनमें एक नाम मदन मोहन दानिश का है." तो कत्तई गलत नहीं कहते. निदा फाजली तो यहाँ तक कहते हैं कि दानिश की ग़ज़ल अपने शख्सी दायरे में इस विधा के तकाजों का एहतराम भी करती है और इन्हीं पाबंदियों में अपने अंदाज़ संवारती है. वो आज के शायर हैं. आज की ज़िन्दगी से उनकी ग़ज़ल का रिश्ता है. इस रिश्ते को उन्होंने ग़ज़ल के तवील इतिहास के शऊर से ज़यादा पुख्ता बनाया है और जो जिया है उसे ग़ज़ल में दर्शाया है. उन्होंने अपने लिए जिस भाषा का इन्तखाब किया है वो सड़क पर चलती भी है, वक़्त के साथ बदलती भी है, चाँद के साथ ढलती भी है.

मुझे याद है जब उनकी ग़ज़ल की पुस्तक "अगर" छापी तो उसकी एक प्रति बड़े प्यार से उन्होंने मुझे भेजी थी... "अगर" आज तक मेरी शेल्फ में सहेजी हुयी है.....जब भी कुछ नया पढने का मन करता हूँ तुरंत उनकी किसी भी ग़ज़ल के दो तीन शेर पढता हूँ यकीं मानिये जिंदगी से जुदा हुआ महसूस करता हूँ। उनकी एक ग़ज़ल मुझे बेहद पसंद है यहाँ लगा रहा हूँ....... आप भी महसूस कीजिये-

जीते जी ये रोज़ का मरना ठीक नहीं,

अपने आप से इतना डरना ठीक नहीं।

मीठी झील का पानी पीने की खातिर,

इस जंगल से रोज़ गुज़रना ठीक नहीं।

कुछ मौजों ने मुझको भी पहचान लिया,

अब दरया के पार उतरना ठीक नहीं।

वरना तुझसे दुनिया बच के निकलेगी,

ख़ुद से इतनी बातें करना ठीक नहीं।

सीधे सच्चे बाशिंदे हैं बस्ती के,

दानिश, इन पर जादू करना ठीक नहीं.

क्रमश:

1 comment:

psingh said...

bhut khub
bhaiya maza agya
dhoom mchegi......waiting for all
members