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Thursday, April 15, 2010

माँ तुझे सलाम....!



ईश्वर का वरदान है माँ
हम बच्चों की जान है माँ
मेरी नींदों का सपना माँ
तुम बिन कौन है अपना माँ
कभी भाई, कभी बहन, कभी पिता बन जाती माँ
ग़र ज़रूरत पडे तो दुर्गा भी बन जाती माँ
ऐ ईश्वर धन्यवाद है तेरा दी मुझे जो ऐसी माँ
है विनती एक यही तुमसे हर बार बने ये हमारी माँ
***प्रभाकर माचवे

प्रभाकर माचवे की यह कविता मुझे बरबस ही याद आ जाती है जब में माँ को याद करता हूँ...... सच कहूं तो ''माँ''.......... एक ऐसा मोहक बंधन है .... एक ऐसी प्यारी भावना है .... शब्दों में बाँध पाना जिसे संभव नहीं.. हम ईश्वर को धन्यवाद देते हैं की उसने न केवल हमे माँ दी.. वरन ऐसी माँ दी जिसने अपने वात्सल्य , स्नेह, प्रेम और संरक्षण से हर पल हमें तराशा... हमे जिंदगी से मुकाबला करना सिखाया...मूल्यों और नैतिकता का पाठ न केवल लगातार पढ़ाया , बल्कि उसे अच्छी तरह रटाया... आज हम सभी भाई ज़िन्दगी में जो भी कुछ जाने हैं... सीखे हैं...किसी लायक हो पाए हैं .....सब हमारी माँ की दुआओं .. उनकी रात दिन की प्रार्थनाओं का ही असर है !

हम भाईओं को पालने में उन्होंने अपनी हस्ती मिटा दी ...पूरी जिंदगी उन्होंने कोई शौक नहीं किये... कोई फरमाइश नहीं की ...जो भी थोडा बहुत पैसा पिताजी अपनी नौकरी में देते रहे ..... एक-एक पैसा बचाकर उन्होंने उसे घर की ...... बच्चों की बेहतरी में लगा दिया... उन्होंने घर, परिवार, समाज में बड़ी मुश्किलों का सामना किया और अर्जुन की तरह एक ही लक्ष्य बनाकर बच्चों की परवरिश में लगी रही........ उनकी तमाम कुर्बानिओं ने मेरी रूह पर कितना असर डाला है ...... मैं बता नहीं सकता..!

घर-परिवार की परवरिश में पिताजी उनको बहुत समय न दे सके...... सो बिना घबराये माँ ने अकेले ही मोर्चा संभाल लिया........हालात ने उन्हें कई बार बेज़ार कर के रख दिया पर हिम्मत नहीं हारी....साध्वी॥ धर्म निष्ठां ॥ संस्कारवान आदर्श माँ का साथ जैसे बस परमात्मा देता रहा....माँ खुद कोई बहुत उच्च शिक्षा प्राप्त न थी पर हमे वे बहुत अच्छी शिक्षा देने को मानो संकल्पबद्ध थी !

आज उनके संघर्षों के प्रतिफल.... यानी हम बच्चे आज बड़े हो गए हैं.....पर आज भी वे बच्चों की तरह हम पर ... हमारी कमजोरीओं पर बराबर ध्यान देती हैं....... हमे सिखाती हैं...हमे मूल्यों , धर्म और नैतिकता की सच्ची राह पर चलने की शिक्षा देती हैं......उन्होंने समाज गरीबों कमजोर लोगों की मदद के लिए हमे सदैव प्रेरित किया है ! माँ ने यूं तो हम चारों को ही बड़ा प्यार दिया... पर सबसे ज्यादा प्यार शायद बड़े भैया को दिया.......उन्होंने भी माँ का बड़ा ख्याल रखा है....बहुत मान रखा है ...मैं इस ज़िन्दगी में शायद उतना न कर सकूं.....कुछ कमी रह गयी है.....माँ मुझे अगले जन्म में मौका ज़रूर देना ... भैया मेरी भी कमी पूरी कर रहे हैं... उन्हें सादर प्रणाम करता हूँ ......वैसे भी मेरा उनसे गहरा रिश्ता है ... उनके बिना मैं कुछ भी नहीं... आज माँ को देखता हूँ तो वे कुछ संतुष्ट .. प्रसन्न तो नजर आती हैं ... उनके संघर्षों की तुलना में हम सब भाई मिलकर भी उतना तो नहीं कर सकते कि उनके ममत्व की बराबरी कर सके......पर उनकी आँखों में ख़ुशी के चंद आंसू भी ला सके तो... हम अपनी ज़िन्दगी को कुछ सार्थक कर पांएगे ..... एक महान माँ...श्रीमती शीला देवी.... को उसके पुत्रों-भतीजों और सिंह सदन के हरेक बच्चे की ओर से शत-शत नमन ......चरण स्पर्श... !


कुदरत में हर चीज़ है...और..सब इन्साफ से बननी है ... माँ तुम धन्य हो... तुमने अपने लिए दुःख , तकलीफे, तंगी, मुश्किलें ले ली.... ताकि तुम्हारे बच्चों की झोली कुदरत खुशियों से भर दे....!

तुम महान हो माँ .... सच में महान हो.........अपने बच्चों को कभी मत छोड़ना.... हम से गलतियाँ होगी ही ...हमे माफ़ करती रहना....!

बस याद रखना ...तुम्हारे बिना हम सब जी न पांएगे......तुम से हमारी दुनिया रोशन है.....तुम्हारी छाया ...तुम्हारे साए के नीचे हम चैन से जी रहे हैं .....!

हम तुमसे हैं... तुम्हारे बिना हम कुछ नहीं हैं....कुछ भी नहीं........कुछ भी नहीं.....! !

* * * * * PANKAJ K. SINGH

Monday, April 12, 2010

वेल डन अम्मा.......

सिंह सदन की खूबसूरती और क़ाबलियत हमारी अम्मा की दुआओं से ही महफूज़ है.अम्मा घर और कुनबे में सबसे बड़ी हैं .घर के पुरुष और महिलाओं पर अम्मा का रसूख साफ देखा जा सकता है .

घर के बच्चों के लिए अम्मा सबसे खूबसूरत चीज़ हैं.घर के बच्चे उनके दीवाने हैं .अम्मा भी बच्चों पर जान छिड़कती हैं.मजाल है कि अम्मा की मौजूदगी में भला कोई बच्चों को तिरछी नजर देख भी ले....बच्चे कितनी भी शैतानी करें अम्मा के रहते सब माफ़.अम्मा घर पर हों तो हर बच्चा उनके पास सोना चाहता है. इस पर बच्चों में जंग भी छिड़ जाती है...लेकिन अम्मा सब सम्भाल लेती हैं. घर में अम्मा का मैं सबसे चहेता हूँ. मैं भी उनको बहुत प्यार करता हूँ........उनसे जुड़े कई संस्मरण है जो आज भी जेहन में तारो-ताज़ा हैं.


अम्मा की बौद्धिक क्षमता का मैं बचपन से ही कयाल हूँ. अम्मा ने इन अस्सी सालों में हर रिश्ता जिया है....जीवन के बहुत से उतार-चढ़ाव देखे हैं. सबमें अम्मा सफल नज़र आती हैं. घर में उनकी स्थिति अंग्रेजी लेखक रस्किन बोंड की कहानियों में "बरगद के पेड़" की तरह है. बदलते दौर में भी अम्मा सब पर भारी नजर आती हैं. अम्मा हर उम्र के बीच चुटकी में सेट हो जाती हैं. एक बार मैं सूफी संत बुल्ले शाह का सूफियाना कलाम सुन रहा था. कलाम मुल्तानी पंजाबी में था. सुनते ही अम्मा ने उसके मायने मुझे समझाए. मैं उनकी इस क़ाबलियत पर दंग रह गया.

..... अम्मा इस उम्र पर अनुभवों से लबरेज है. घर के अन्य सदस्य अम्मा के अनुभवों से लाभ लेते रहते हैं .अम्मा को धर्म और दर्शन को समझने की गज़ब की क्षमता है. अब आप लोग समझते होगें की अम्मा बेहद पढ़ी -लिखी होगीं.... ऐसा बिलकुल भी नहीं है.

उनकी स्कूली तालीम सिफ़र है..................ये बात अलग है की वे अपना और घर के सदस्यों का नाम लिख लेती हैं . अखबार की हेडिंग पढ़ लेती हैं. बचपन में अम्मा मुझ से चोरी छिपे छोटे भाई श्यामू की हिंदी की ओलम की किताब लेकर मुझ से पढ़ती थी. तब कुछ भी मुझे समझ नहीं आता था.....लेकिन अब सब समझ में आता है.

अम्मा की इस उम्र में भी सीखने और कुछ करने का जूनून मेरे लिए हमेशा प्रेरणा का कारण रहा है. अम्मा ने मुझ से पढना-लिखना सिखा ये मेरे जिंदगी के सबसे खुबसूरत अनुभवों में एक है. अम्मा के हौसले और जूनून को सलाम....

***** HRADESH K. SINGH '' JONY ''

Sunday, April 11, 2010

मिले सुर मेरा तुम्हारा......!

21 मार्च 2010 का दिन सिंह- सदन के लिए इसलिए महत्त्वपूर्ण रहा कि इस दिन पहली बार जोनी यानि अपने हृदेश के संयोजकत्व में मैनपुरी मेला मंच पर "युवा महोत्सव" आयोजित किया गया. परंपरागत प्रदर्शनी से जोनी का जुड़ना एक उपलब्धि की बात है.......अब तो खैर मेले-ठेले उतने आकर्षण के बिंदु नहीं रहे जितने एक-दो दशक पहले हुआ करते थे.........जब लोग साल साल भर नुमाईश लगने का इन्तिज़ार करते थे, और एक एक सप्ताह के लिए अपने अपने गावों से आकर इस आयोजन का मज़ा लेते थे........मनोरंजन-संचार के साधन कम होने की वजह से नुमाइश का आकर्षण सहज और स्वाभाविक था.....!


वापस लौटते हैं इस बार की '' नुमाइश '' पर .....मेरा और पंकज दोनों का यह मानना था कि जोनी को प्रदर्शनी की सदस्यता लेकर कुछ नया ताज़ा सा कार्यक्रम करना चाहिए.......बहरहाल जोनी ने ऐसा किया भी. जोनी ने प्रदर्शनी की सदस्यता ग्रहण कर "युवा महोत्सव" का संयोजक बनने का अवसर प्राप्त किया. हम सब ने यह निर्णय लिया कि इस कार्यक्रम को पूरी ऊँचाई तक ले जाना है...... ईश्वर की कृपा से हम कामयाब भी हुए.
हमने दिन में कार्यक्रम के अंतर्गत कादंबरी मंच पर युवाओं को मोटिवेट करने विषयक एक सेमिनार " मैनपुरी में शिक्षित युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर" आयोजित किया. इस सेमिनार में विभिन्न क्षेत्रों के नामचीन प्रतिनिधियों को बुलाकर ओपन सेसन कराया.....रात में इसी मंच पर एक रंगारंग संगीत कार्यक्रम भी कराया. इस रंगारंग संगीत कार्यक्रम में स्थानीय बालक-बालिकाओं ने गायन और नृत्य का तो प्रदर्शन किया ही......दिल्ली और मुंबई से आमंत्रित कलाकारों तो अपने हुनर का प्रदर्शन कर महफ़िल लूट ली. गौरव बांगिया जो इन्डियन आइडल के प्रतिभागी थे उन्होंने क़र्ज़ फिल्म के गाने गाकर श्रोताओं को जूमने पर मजबूर कर दिया. सारेगामा वाले रेहान खान ने भी "दर्दे दिल दर्दे जिगर गाकर" अपनी क़ाबलियत का एहसास करा गए. बरेली से आये ग़ज़ल गायक बन्धु मुजाहिद- मुशाहिद ने गुलाम अली की "याद याद याद बस याद रह जाती है" गाकर मंच को तालियाँ बजाने पर मजबूर कर दिया. दिल्ली के फ्यूजन ग्रुप ने सितार वादन प्रस्तुत कर और चन्दन दास की गायी ग़ज़ल गाकर शमाँ बांध दिया. प्रोग्राम में सोनी टीवी वाली सोनम अस्थाना ने "कजरारे" पर जो नृत्य किया तो लगा ही नहीं की रात के दो बज चुके हैं.......दर्शक-श्रोता उतनी ही मजबूती से प्रांगन में जमे हुए थे.


यह प्रोग्राम जोनी ने जिस खूबसूरती से सजाया था...........मैं समझता हूँ कि उतनी ही जिम्मेदारी घर के अन्य सदस्यों पंकज, पुष्पेन्द्र, प्रमोद रत्न, संदीप, दिलीप, टिंकू, दिलीप ने भी निभायी थी. रात के आखिरी पहर हम सबने जब कार्यक्रम संचालक चेतन की मांग पर " मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा....." गाया तो लगा कि इस गीत के सही मायने क्या हैं..........!
(इस विषय पर और अधिक जानने के लिए सत्यम न्यूज पर पढ़िए आलेख-http://satyammpi.blogspot.com/2010/04/blog-post.html)
*****प्रस्तुति- पकु2

Saturday, April 10, 2010

दिल की बातें .......दिल ही जाने !


प्रियजनों,

सिंह सदन के ओफिसिअल ब्लॉग पर मैं पंकज के. सिंह आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ !

इस "ब्लॉग" पर लिखते हुए मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है ! " सिंह सदन " के सदस्य के रूप में मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूँ .... मुझे सह्रदय माँ , " सरपरस्त " बड़े भाई का सहारा मिला , पिता से अच्छे सबक मिले, छोटे प्यार करने वाले आज्ञाकारी भाई जोनी ,श्यामू , पिंटू ने मुझे मजबूती दी .... इन के साथ भाभी के रूप में एक वरदान मिला है ....हमारे लिए वे माँ के बराबर ही हैं........प्रिया...इशिका....संदीप.. ....दिलीप..चिंटू...बिटिया...डॉक्टर साब ... रत्न साहब ...लक्ष्मी...गौरी...उषा दी ...... इन सबके बारे मैं क्या कहू ....ये सब दिल के बेहद करीब हैं !

इस ब्लॉग पर धीरे - धीरे बड़ा मज़ा आ रहा है क्योंकि जिन्हें आप दिल से प्यार करते हैं..... उनके बारे में आप सैकड़ों घंटे बात कर सकते हैं ....पूरी - पूरी किताब लिख सकते हैं .....आज मैं इस ब्लॉग पर सबसे पहले चंद अशआर अपनी सबसे प्रिय ....सबकी दुलारी....सिंह सदन की बार्बी डॉल ....''.लीची'' को बड़े प्यार के साथ भेंट करता हूँ....

तुम्हारी बातें अच्छी हैं, तुम्हारी रूह अच्छी है.......... जुबां से दिल की बातें बोलती हो ! !

हमें क्या फर्क पड़ता है कटीले जंगलों से .......... वहीँ बन जाएगा गुलशन जहां तुम खेलती हो ! !

तुम्हारी बातें मीठी हैं हमें न इनमे उलझाओ .......... शरारत तुमको करनी है , हमें क्यूँ बोलती हो ! !

कुछ ऐसी बातें हैं , तुम्हे नाराज़ करती हैं ............. नहीं करती शिकायत बस नज़र से बोलती हो ! !

तुम अपने छोटे क़दमों से ये दुनिया नाप सकती हो ................. ज़रा धीमे चलो , क्यूँ नाहक दौड़ती हो ! !

अनेकों मुश्किलें हैं , मुश्किलों का एक हल ....तुम हो ................. निपट लेंगे हम इनसे , क्यूँ अभी से सोचती हो ! !

तुम ही तुम हो नज़र में , ये दुनिया तुम से रोशन है .............. नहीं यूँ ही तुम्हारा नाम लीची है.. शहद सा घोलती हो ! !

फिर मिलेंगे प्रियजनों .... आप का हमराह.... हमकदम ... हमसफ़र... पंकज के. सिंह !

इब्तिदा.........!


सिंह सदन का होम ब्लॉग “सिंह सदन -ए हट अंडर द स्काई” शुरू हो गया है...........इस ब्लॉग के ज़रिये हम आपको ‘सिंह सदन से’ जुडी हरचीज को सामने लेन का प्रयास करेंगे ..........यह एक सहकारी प्रयास होगा जिसमें परिवार के अधिकाधिक सदस्य जुड़ेंगे..........तो ब्लॉग पर सिंह-सदन से जुडी हरगतिविधि और व्यक्ति का तार्रुफ़ करने का जिम्मा भी इसी घर के सदयों को ही लेना था......यह जिम्मेदारी घर के लोगों ने ली भी है। सभी ने अपने अपने रूचि के क्षेत्रों को चुना है, पूरे मन से उस कलम को लिखने का प्रयास भी किया है .......! सभी सदस्यों ने जिन विषयों पर जिन शीर्षकों के अंतर्गत लिखने का जिम्मा उठाया है.....उसे मैं ब्रीफ किये देता हूँ....


सुनहरी यादें-- यह कालम मेरे द्वारा लिखा जायेगा जिसमे सिंह सदन से जुड़े हुए हर पहलू को उकेरा जाएगा.


ताना बाना -- घर सिर्फ घर के सदस्यों से ही नहीं बनता....वो बनता है आस-पास के लोगों से, सिंह-सदन से जुड़े उन तमाम लोगों के विषय में इस कालम में लिखा जायेगा, इस कोलम को लिखने का जिम्मा टाइगर पंकज सिंह और मैं निभाएंगे।



आर्काइव -- खुशनुमा लम्हों को फोटो और वीडीओ में कैद करने की जिम्मेदारी और आप तक पहुँचाने की जिम्मेदारी ली है इस ब्लॉग के संपादक हृदेश ने.


तार्रुफ़--सिंह सदन के पारिवारिक सदस्यों के बारे में तफसील से लिखने की जिम्मेदारी ली है हृदेश, पंकज और ब्लॉग के उप संपादक पुष्पेन्द्र ने।


गतिविधियाँ-- घर की हर गतिविधि को ब्लॉग पर लाने की जिम्मेदारी ली है संपादक हृदेश ने। इसमें सामाजिक सारोकारों और त्योहारों के उल्लास को समेटा जायेगा.


दूसरा पहलू--घर के सदस्यों के छुपे हुए हुनर और उनके राजों को रोचक तरीके से पेश करने की जिम्मेदारी ली है अंजू और श्यामकांत ने.......जरा संभल कर रहिएगा.....!


फुलवारी-- बच्चों की प्यारी प्यारी गतिविधियों को आप तक पहुंचाएंगी प्रिया।


कतरन-- सिंह सदन के लोगों का पुराना शगल लेखन रहा है.....तो पुराने पत्र -पत्रिकाओं से कतरन पेश करेंगे उप संपादक पुष्पेन्द्र


फलक-- घर महज़ एक स्थानीय भौगोलिक इकाई नहीं होती...इसका विस्तार होता है वहां तक जहाँ तक घर के सदस्य रहते हैं......कसौली-गाजीपुर-मेदेपुर-गोरखपुर-नगला रते यह सब भी सिंह सदन के विस्तार हैं......नए फलक हैं, यहाँ की गतिविधियों को सामने लाने का जिम्मा उठाएंगे उप संपादक पुष्पेन्द्र......!