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Tuesday, September 28, 2010

वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा...............


मै दिलीप कुमार आपके सामने उपस्थित हो रहा हूँ ..................
लम्बे समय से जो अकाल ब्लॉग पर पड़ा था उसे ख़त्म करने के लिए मै एक सुंदर रचना आपके सामने ला रहा हूँ ................
आशा है आपको पसंद आएगी ..............................
वैसे मैंने जो कुछ सीखा है वो अपने पवन मामा और पंकज मामा से ही सीखा है ...............
वे वास्तव में महान हैं उनको मै हमेशा याद करता हूँ .............
अगर मेरी रचना मै कुछ कमी लगे तो माफ़ न करना वरन मुझे उचित सलाह देना..........
..
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झील का निर्जन किनारा....
और यह सहसा छाए सन्नाटे का एक लम्हा हमारा ....
रौशनी की किरण का शिला से टकराना .....................
टकराकर वो तरुण के एक अंश में मिल जाना ............
वैसा नज़ारा फिर न देखा........................................
वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा...................................


सहसा नज़र गयी मेरी जब.......................................
बादलों की टोलियों पर.............................................
लगता है कि जैसे सारे मेघ एक समूह बनाकर.......
झील कि और चले आ रहे हों ढोल बजा कर ..............
ढोल बजाकर ताशे बजाकर ,हाथों में चादर लपेट कर..
वैसा नज़ारा फिर ना देखा.......................................
वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा.................................
.
अकस्मात मेरे पास आकर .......................................
मेरा थोडा सा परिहास बनाकर ................................
किरण और जल की saanth -गाँठ से.........................
मेरे नैनों पर जो रौशनी हुई है....................................
आँख खुली तो मैंने देखा थोडा सोचा.......................
लगता है कुछ शरारत हुई है ...................................
लगता है कुछ शरारत हुई है.................................
वास्तव में ऐसा नज़ारा फिर न देखा ....................
वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा............................

दिलीप कुमार......

8 comments:

Akhtar Khan Akela said...

dilip bhayi achchi rchna he bhut vishvas ke sath likhi gyi he isliye pyar or bdh gya he mubaark ho. akhtar khan akela kota rajsthan

Akhtar Khan Akela said...

dilip bhayi achchi rchna he bhut vishvas ke sath likhi gyi he isliye pyar or bdh gya he mubaark ho. akhtar khan akela kota rajsthan

SINGHSADAN said...

बहुत सुन्दर.....भावों को व्यक्त- अभिव्यक्त करती हुई मोहक रचना.....!
prakrit ki chataa me nahaii yeh kavita bahut hi mohak है
तस्वीर आँखों के सामने घूम गयी......
झील का निर्जन किनारा....
और यह सहसा छाए सन्नाटे का एक लम्हा हमारा ....
रौशनी की किरण का शिला से टकराना .....................
टकराकर वो तरुण के एक अंश में मिल जाना ............
वैसा नज़ारा फिर न देखा........................................
वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा...................................


वाह वाह.......ऐसे ही लिखते रहो.....!


सहसा नज़र गयी मेरी जब.......................................
बादलों की टोलियों पर.............................................
लगता है कि जैसे सारे मेघ एक समूह बनाकर.......
झील कि और चले आ रहे हों ढोल बजा कर ..............
ढोल बजाकर ताशे बजाकर ,हाथों में चादर लपेट कर..
वैसा नज़ारा फिर ना देखा.......................................
वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा.................................
. क्या खूब शब्दों से रचना को हृदयाभिराम बना दिया है.......

अकस्मात मेरे पास आकर .......................................
मेरा थोडा सा परिहास बनाकर ................................
किरण और जल की सांठ- गाँठ से.........................
मेरे नैनों पर जो रौशनी हुई है....................................
आँख खुली तो मैंने देखा थोडा सोचा.......................
लगता है कुछ शरारत हुई है ...................................
लगता है कुछ शरारत हुई है.................................
वास्तव में ऐसा नज़ारा फिर न देखा ....................
वह सोंदर्य नज़ारा फिर न देखा............................

किरण और जल की सांठ- गाँठ .....उफ़ क्या कल्पना है..........!!!!!!!!!!!!!!!!!!
दिलीप .... तुम इतना अच्छा लिख सकते हो ......विश्वास नहीं होता, मगर मानना तो पड़ेगा. अगली प्रस्तुति का बेसब्री से इंतिज़ार रहेगा....बहुत बहुत शुभकामनायें.
*****
PK

psingh said...

dilip vah
achha likha khusurat shbdon ka khubsurt chyan
likhte raho
badhaiyan

SINGHSADAN said...

दिलीप बहुत सुंदर लिखा तुमने ......................
भैय्या ने भी काफी सराहना की है मैं जब भी कोई कविता इस ब्लॉग पर पड़ता हूँ मै तब तक कोई कमेन्ट नहीं देता..........
जब तक बड़े भैय्या उस पर अपनी राय नहीं दे देते अगर वो कह दें की पास तो समझो पास....................
ओके ...............
दिलीप इतना सुंदर लिखने पर तुम्हें बधाई हो भैय्या के बाद उनके नक्से- कदम पर चलने वाले तुम सच्चे अनुयायी हो.............

shyam kant

सत्यम न्यूज़ said...

कविता अच्छी है....पढाई पर भी ध्यान दो....बाकि मिलने पर करूँगा....

ShyamKant said...

वाह दिलीप बहुत अच्छा लिखा है ....................
तुमने जो प्रकृति का वर्णन किया बहुत खूब .................
तुमने कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया मज़ा आ गया .......................
टिंकू

pankaj said...

dear dilip..

this poem is full of life, beauty ,sprituality and purity. i am proud of you . god bless you.