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Saturday, June 12, 2010

संतों के संत ज्ञानियों के ज्ञानी........ज्ञान सिंह


"ज्ञान सिंह के ज्ञान का कोई न पाया पार |
पुलिस प्रशासन आये दिन करता है सत्कार |"


आज में जिस महान विभूति से आपका तारुफ़ कराने जा रहा हूँ |बे संतों के संत ज्ञानियों के ज्ञानी श्री ज्ञान सिंह जी है |ज्ञान सिंह जी का जन्म यही कोई ३० दशक पहले मैनपुरी जिले के हरवाई ग्राम में हुआ |
वे बचपन से बड़े अदभुत थे हर चीज में बारीकी निकलते थे और हर एक कम को करने में लालायत रहते
उनकी इस प्रतिभा को देख कर उनका नाम ज्ञान सिंह रखा गया |ज्ञान जी बचपन से ही हरफन मौला किस्म
के इन्सान थे वे शिक्षा में ध्यान न लगाकर शिक्षा प्रणाली को ही बदलना चाहते थे |
उनकी शिक्षा दीक्षा बहुत ज्यादा नहीं हुई पर बे सर्व गुण सम्पन हो गए........उन्हों ने हर चीज में P .H .D किया है
और अपने बूते पर काबिल इन्सान बने | वे एक उम्दा डाक्टर भी है और……. वकील भी |
जानवरों पर उन्हों ने बहुत प्रक्टिस की और और अनिमल स्पेस्लिस्ट बन गए आज पुरे एरिया में उनका नाम है ………….वे दवाइयां भी स्वेम निर्मित करे है |वे अच्छे लीगल एडवाइजर भी है आस पास का हर आदमी उनसे ज्ञान लेने आता है | जिसकी बे फ़ीस बसूल करते है |

हर तरह का काम वे गारंटी शुदा करते है | पुलिस हो या प्रशासन हर क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ है |
वे कभी भी शारीरिक मेहनत नहीं करते शिर्फ़ दिमाग का इस्तेमाल करते है और काम पेंतीस कर देते है |
ज्ञान सिंह जी हमेशा मजाकिया अंदाज में रहते है मखौल करना उन्हें पसंद है
ज्ञान सिंह जी बहुत ही शर्मीले स्वाभाव के है लेकिन शादी विवाह में उनका मेन रोल रहता है बगैर उनके शादी
या किसी भी फंग्शन में मजा ही नहीं आता वे खुद तो मजा लेते ही है और मजा लुटाते भी है |
उनका फूल बनाकर नोटों का उड़ाना बेहद फेमस स्टाइल है | और डांस का स्टाइल वही............... अंगोछा या दुपट्टा ओढ़ के शमां बांध देते है ...............नागिन डांस उनका फेवरेट डांस है|

जब भी वे ससुराल यानी मेदेपुर में आते है तो कंधे पर तौलिया मुंह में पान हाथ में मिठाई का डिब्बा सुशोभित रहता है |और जबतक की उनको बढ़िया शर्बत या चाय न पिलाई जाये सीधे मुंह बात नहीं करते ...........नाश्ता पानी के बाद अपनी लय में आजाते है
उनको जीजा कहलवाना बहुत अच्छा लगता है जब भी कोई उन्हें जीजा कह कर पुकारता है तो ख़ुशी के मारे गुड़ीमुड़ी हो जाते है |
उनका फेवरेट साला श्यामू है | वे बहुत अच्छे शायर भी है और बातें शयराना अंदाज में पूर्ण बिराम के साथ करते है
एक बहुत ही अच्छा वान्क्या मुझे याद आरहा है बात उनदिनों की है जब बड़े भइया कानपुर में पोस्टेड थे तब ज्ञान जी सी .आर .पी. एफ की भर्ती
देखने आये हुए थे उनकी बचपन से ही पुलिस में नौकरी करने की तम्मना रही है उन्हों ने बहुत सारी भर्ती देखी मगर ये उनका लक था की वे
भर्ती नहीं हो पाए खैर में टोपिक पर आता हूँ श्यामू के साथ वे नबाब गंज घूमने निकले तो एक जगह बताशे की दुकान पर रुके और बताशे
खाते खाते बोले - भाई साहब मेरे गल क्यों नहीं भरते
बो बोला - आप एक काम क्यों नहीं करते बोले क्या
बो बोला - गाल तो भर जायेंगे मगर कुछ रुपये खर्च हो जायेंगे बोले
रुपये किसको चाहिए बस गाल ममता कुलकर्णी से दिखने चाहिए |

उनके शायराना अंदाज का एक नमूना और -

मामला बबलू भैया की शादी का है हमारे यंहां एक रश्म होती है बरोना की तो ज्ञान जी बरोना लेकर जब पहुंचे
तो महिलाओं ने इनको धर दबोचा और और रस्म के मुताबिक बेलन से स्वागत किया और ऐसी ऐसी जगह बेलन देदिए की बताने में शर्मा रहे थे |
एक जबरदस्त महिला ने तो हद ही कर दी उनकी कमर पकड़ कर चासनी की कढाई में देमारा बेचारे ज्ञान जी छटपटाते रह गए
उसके बाद का सीन देखने लायक था जब ज्ञान जी रसगुल्ले जैसे चासनी से निकले तो लोगों की हंसी नहीं रुक रही थी
जनमासे में जब बे पहुंचे तो बहुत ताव खाए हुए थे रिंकू ने जब उन्हें पूछा क्या हुआ तो गुस्सा गये और बोले-

तेरे भाई की होगयी शादी |
और मेरी होगयी बर्बादी ||
सारी बारात हँसते हँसते लोट पोट हो गयी ........................
उनके फेवरेट सिंगर आधार चेतन्य है ......उनकी कुछ शायरी में यहाँ पेश कर रहा हूँ |
" टेम्पो चढ़ा पहाड़ पे पेट्रोल ख़तम हो गया |
बुढिया ने आंख मारी और बुढ्ढा ख़तम ................"

"मालिक की गाड़ी ड्राइवर का पसीना
चलती है रोड पे बनके ......................"
इतनी सुन्दर शायरी शायद ही आप ने पढ़ी हो ज्ञान जी सिंह सदन के लिए बहुत महत्वपूर्ण शख्श है |

Psingh

Wednesday, May 5, 2010

एक महापुरुष................................


आज में तार्रुफ़ करने जा रहा हूँ ..... एक इसे शख्स का जो दया ,दान, धर्म की मूर्ति है .... जी हाँ ....में बात कर रहा हूँ .... परम आदरणीय श्रधेय ..... " प्रमोद रत्न " जी की !

प्रमोद भैया .... हम सभी भाइयों में सबसे बड़े है ...... और " बडप्पन " उनमे कूट कूट कर भरा है !....... उनका जन्म आज से यही कोई चार दशक पहले " मेदेपुर " गाँव में हुआ .............बचपन से ही वह पूरे घर के लाडले रहे .... तब से आज तक वे सभी केदिलों पर राज कर रहे है ...........वे घर ही नहीं पूरे गाँव के चहीते है उनहोंने सामाजिक व् आर्थिक परिस्थियों का डट कर सामना किया

मुझे आज भी याद है .... जब भइया इंटर में थे .... तो कड़ाके कि शर्द रातों में ... " पी . आर . डी . " कि ड्यूटी किया करते थे .... स्नातक करने के बाद उनहोंने " सहारा इण्डिया " में काम किया एवं अपना स्कूल भी चलाया ..........एक " कर्मठ पुरुष " जितना संघर्ष कर सकता है किया ! ......मगर इन सब के बजूद हमेशा खुश रहे ...............मुझे अच्छी तरह याद है बचपन में भइया हमें साईकिल से " नुमाइश " दिखाने ले जाया करते थे ......और खुले असमान के नीचे ..... दोनों भाई बैठ कर रात गुजरा करते थे

भइया का संघर्ष जारी रहा .... और उन्हें सन २००० में " विशिष्ट बी. टी .सी . " के तहत अध्यापक की नोकरी मिली .... आज वे जूनियर हाई स्कूल में अधयापक है

एसा कम ही देखा जाता है .........कि किसी इन्सान का कोई विरोधी न हो .... मगर हमारे भइया एसे ही ......अदभुत इन्सान है ! ......पूरा गाँव क्षेत्र उनको सम्मान और प्रेम देता है ! शायद ही एसा कोई सामाजिक कार्य हो ..... जिसमे भइया उपस्थित न होते हों ........... उनकी राय अवश्य ली जाती है
वह एसे उदार ह्रदयी और दानी पुरुष है....... कि कोई अगर उनसे कुछ मांग दे .... तो बाहने या ना का तो प्रश्न ही नहीं उठता......पिताजी को भइया पर बेहद फक्र है वे उन्हें .........महात्मा की संज्ञा देते है ... और सच भी है ... वे किसी महापुरुष से कम नहीं है

भइया एक " हास्य कवी " भी है .... उनकी कवितायेँ हम सभी भाई बहुत चाव से सुनते है भइया कभी कोई टेंशन ना तो लेते है ... और नहीं देते है ! वे कभी समस्याओं में नहीं घिरते ! कोई उनसे कुछ कहता भी है ... तो हंस कर टाल देते है
हमारे बड़े भइया पूज्यनीय श्री पवन जी .... इन्हें अपना गुरु मानते है ........और महापुरुष की संज्ञा देते है ....इस ज़माने में भइया जैसे महापुरुष विरले ही पैदा होते है ...... हर रिश्ते को उन्होंने बड़ी संजीदगी से जिया है ! ....परिवार व रिश्तेदरियों में वह अपनी भूमिका बखूबी निभाते है .... आज में जो भी कुछु हूँ ... उनकी बरसों की तपस्या ....और उनके आशीर्वाद का नतीजा है
मै एसे महापुरुष को सैकड़ों बार नमन करता हूँ ......................



तारुफ़ के लिए पुष्पेन्द्र सिंह

Sunday, May 2, 2010

राही.. तू मत रुक जाना ...

........ उनकी आखों में ... '' बुनियादी ख्वाब '' ...... चाल में '' उर्जा '' और '' आत्मविश्वास '' ......... तथा मिजाज़ में एक खास किस्म का '' अल्हड़पन '' और '' मस्ती '' है .... वे गंभीर बातें सोचते हैं ...... पर अंदाज बेहद सामान्य और विनोदी रहता है ..... !

........ '' लौकिक '' व्यव्हार और मनोवैज्ञानिक चिंतन की ऐसी दिलचस्प .... और प्राय दुर्लभ '' जुगलबंदी '' पेश करती एक अज़ीम शख्सियत हैं ....... हमारे प्रिय अनुज ....... ह्रदेश कुमार सिंह ... उर्फ़ '' जोनी '' !

जोनी '' मैनपुरी '' जनपद ....... और आस - पास के कई जनपदों में एक बेहद लोकप्रिय नाम है ! '' सिंह सदन '' परिवार की सबसे '' नामचीन '' हस्तियों में ये शुमार हैं ....... जोनी '' सिंह सदन '' और इसके सभी विस्तार पटलों में बच्चों से लेकर बड़ों तक हरदिल अज़ीज़ हैं ...... इनसे ही '' सिंह सदन '' की महफ़िलें रोशन और मस्त होती हैं ..... जोनी '' सिंह सदन '' की अमूल्य निधि सिद्ध हुए हैं ...... वे वास्तव में '' सिंह सदन '' की रौनक हैं ...!

१९८४ में ...... '' सिंह सदन '' में जन्मे जोनी की किताबी तालीम में बचपन में कोई रूचि नहीं थी ..... किताबें - विद्यालय - अध्यापक ...... ये सब इनकी रूचि के '' बाहर '' के विषय थे ....... पर बचपन से ही ..... जोनी एक खुद्दार तबियत के इंसान थे ...... इन्होने कभी किसी का सहारा लेना मुनासिब न समझा ........ अपने लिए खुद ही मंजिले बनाई और उन्हें पाया भी .......

......... हालात से कभी न घबराने ....... और मुश्किल परिस्तिथियों से जूझने के '' जीवट हौसले '' का नाम जोनी है .... स्कूल में आने पर ये '' एन . सी . सी . '' में दाखिल हुए ...... और '' गड्तंत्र दिवस परेड '' में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया ...... भाईओं से प्रेरित होकर ....... मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में दिलचस्पी जगी ...... और कालांतर में एक '' काबिल लेखक '' के रूप में व्यापक प्रसिद्धि पाई ..!

कठिन परीक्षा पास कर मीडिया के देश के सर्वोच्च संस्थान '' आई . आई . एम . सी . '' दिल्ली से पत्रकारिता की डिग्री ली ....... '' अमर उजाला '' , '' दैनिक जागरण '' , '' हिंदुस्तान '' में तीन से चार वर्ष काम किया ....... पर नौकरी से इन्हें '' आत्मिक संतुष्टि '' प्राप्त न हो सकी ....... वे कुछ अलग ... कुछ मानवीय ..... कुछ कल्याणकारी ..... कुछ वास्तविक ... करना चाहते थे सो उन्होंने एक '' बड़ा '' निर्णय लिया ..... आज की उस नई पीढ़ी से नितांत अलग ...... जो पैसे ... सुविधा .... और महानगरों को ही कामयाबी का पैमाना मानती है ..... उन्होंने दिल्ली , मुंबई , देहरादून और लखनऊ को छोड़कर '' अपने क्षेत्र '' और '' अपने लोगों '' के बीच उनके विकास के लिए काम करने का निर्णय लिया .... अपना न्यूज़ चैनल ...... '' सत्यम '' शुरू किया ...... जिसने विगत तीन वर्षों में ... '' विकास पत्रकारिता '' और '' वेलफेयर जर्नलिज्म '' ...... को नए आयाम देते हुए जबरदस्त '' टी आर पी '' अर्जित की है ...!

" सत्यम " ने केवल ख़बरों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है ........ वरन लोगों की '' समस्याओं '' से खुद को जोड़ा है और इनसे आवाम को निजात दिलाई है ...... !

" सत्यम " और जोनी ...... आज लाखों असहाय .... ग्रामीण ....... गरीब ......... दलित जनता के लिए आशा और विश्वास के प्रतीक बने हुए हैं .......! जोनी की वजह से हम दोनों भाइयों को क्षेत्र के विकास के लिए नई परियोजनाएं सोचने और क्रियान्वित करने में बड़ी सुविधा हुयी है !

जोनी को उनके " सराहनीय कार्यों " के लिए २००९ में '' राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार '' तथा '' ज्योतिबा राव फुले नेशनल स्कोलर शिप '' से सम्मानित किया गया ..... जोनी पर '' सिंह सदन '' परिवार को गर्व है ..... तथा हमारी शुभ कामनाएं हैं कि वे जीवन पथ पर सफलता पूर्वक द्रण क़दमों से आगे बढें ........ और '' अध्यात्मिक स्तर '' पर खुद को उन्नत करते हुए अपने जीवन को लोकोपयोगी बनाये ....... और '' निष्काम कर्मयोगी '' के रूप में सर्वोच्च प्रतिष्ठा प्राप्त करे ...!

...... सदैव स्मरण रहे ...... कि इतिहास '' केवल '' उनका है ... जिन्होंने दूसरों के लिए '' त्याग '' और '' बलिदान '' किये हैं तुमने भी ऐसी ही राह चुनी है ....... ये कठिन है ....... इसमें कांटे हैं ....... पर तुम्हारी मंजिल यही है ... आगे बढ़ो .......... हम सब तुम्हारे साथ हैं ! !

* * * * * PANKAJ K. SINGH

Saturday, May 1, 2010

अजीमो शान शहंशाह ................सलामत रहें ......



.........एक और '' सिकंदर '' ................

यह सुन कर आपको तज्जुब जरुर होगा कि दूसरा '' सिकंदर '' कौन है |

इस '' सिकंदर '' का जन्म मैनपुरी के '' सिंह सदन '' परिवार में हुआ है|जरा सोचिये कौन है वो .................सही समझा आपने में बात कर रहा हूँ ......... '' सिंह सदन '' के '' आइकोन '' और अपने बड़े भइया मिस्टर पंकज सिंह की ........

.................भैया बचपन से ही '' तीव्र बुद्धि '' के .... बहुत महत्वाकांक्षी व्यक्ति रहे है |बचपन से ही ......... बे कुछ '' अलग '' थे ....... उनकी विचार धारा .... '' अलग '' थी ! ..... एक तरफ जहाँ हमारे बड़े भइया ..... महात्मा इस्टाइल में रहते थे ...........वहीँ पंकज भइया को लोगों पर .......... रोब झाड़ने का शौक था | ........ वे हमेशा '' लीडर शिप '' किया करते थे | ..........बे हमेशा इन्सान को झुकाने में यकीन रखते थे |


........पढने में इतने तेज थे ......... की हर एक क्लास में '' अब्बल '' रहे | वे गणित के सवाल '' मौखिक '' हल किया करते थे | .......... तब हम लोग इस को '' जादू '' समझते थे .......... टीचर को वे ..... टीचर नहीं बल्कि '' दोस्त '' समझते थे |

.......मुझे आज भी याद है ..... जब वे ६ कक्षा में थे तो टीचर उनसे मिलाने घर आया करते थे | ..... मै उनका वो '' जादू '' आज तक नहीं समझ पाया हूँ ............... भइया जब छुट्टियों में ...... गाँव आया करते थे तो ....हम जोनी श्यामूऔर बड़े भइया ....... '' आवादी '' में बहुत मजे किया करते थे..............उस समय '' शहंशाह '' फिल्म रिलीज हुई थी .....हम लो फिल्म की .... शूटिंग किया करते थे जिसमे ..... . पंकज भैया ............... हमेशा शहंशाह बनते थे ..........और हम लोग ....... दालमोठ ,बिस्किट,लईया , चने, टॉफी बहुत खाया करते थे |

भइया के गाँव आने का इंतजार ..... हम से .......ज्यादा गाँव के '' कप्तान '' दुकानदार को रहता था ....क्योंकि उसी बिक्री जोरों पर होती थी .................

...............कब खेलते - खेलते '' बड़े '' हो गए पता ही नहीं चला..............

भैया को '' साईकिल रेसिंग '' का बहुत शौक था ................और क्रिकेट के मंडल स्तर के '' फास्ट बोलर ''रह चुके है .......... क्योंकि हमारे घर में ..... पढाई पर ज्यादा जोर दिया जाता है............इस लिए क्रिकेट छोड़ना पड़ा ......... इमरान खान ..... आपका फेवरेट खिलाडी है............

भैया ..ग्रेजुएशन के साथ साथ '' पत्रकारिता '' से भी जुड़ गए ..... और मैनपुरी की '' पत्रकारिता '' को नया आयाम दिया ........और पत्रकारिता के ..... '' नए स्तम्भ '' बन कर उभरे .................


भैया ने जीवन में कभी ........पीछे मुड़ कर नहीं देखा ...... कदम बढे ..... तो रुके नहीं .........हजारों मुश्किलों को पार कर मंजिल प्राप्त की |

..... '' I I M C '' से डिप्लोमा करने के बाद उनहोने '' स्टार न्यूज ''........ में कुछ दिन काम किया ..........मगर उनकी मजिल .......कुछ और ही थी ......... इसके बाद भैया ने '' सिविल सर्विसिज '' की परीक्षा पास कर के ..... सेल टेक्स कमिश्नर बन के ....... देश की सेवा कर रहे है | उनके जैसा लगन शील ....... इन्सान मैंने नहीं देखा ......... जो चाहा ........ वो पाया ......... बेहद मेहनती इन्सान है |

भइया बहुत ही महत्वाकांक्षी इन्सान है ........'' संतुष्टि '' जैसा शब्द उनकी '' डिक्सनरी '' में है ही नहीं |.........हमारे .....'' परम पूज्य ''...... बड़े भईया भी कहते है ........ की " पंकज '' जैसा ....... लगनशील ...... और मेहनती इन्सान .......मैंने नहीं देखा".....!

वे एक अछे इन्सान होने के साथ - साथ ....... एक आदर्श बेटे और ..... सभी भाइयों के प्यारे भईया है ..........वे हर साल '' मकर संक्रांति '' पर गरीबों में कम्बल वितरण करते है ..........और कोई भी '' जरुरत मंद '' ........ मदत के लिए उनके पास पहुचता है ......... तो खली हाथ नहीं आता | वे हर एक आगे बढ़ने वाले की ......... तन - मन - धन से मदत करते है ..........

एसे महान इन्सान को ......... में बारम्बार प्रणाम करता हूँ ..............अभिनन्दन करता हूँ |

पुष्पेन्द्र सिंह

Saturday, April 24, 2010

''बाग़'' जो आज महका है .... बरसों एक माली ने अपने खून - पसीने से सींचा है ....

न जाने कितने दशकों का संघर्ष है...... हमारे अनेक पूर्वजों के संचित कर्मों , पुण्यों संस्कारों का प्रतिफल है ... कि '' सिंह सदन '' रूपी बाग़ लगातार शनै:- शनै: पुष्पित - पल्लवित हुआ है...... थोडा बहुत छायादार भी हुआ है .....

अपने पूर्वजों के दिखाए सदमार्गों पर आज भी '' सिंह सदन '' कि नई पीढियां चल रही हैं ...... और शीश झुकाकर श्रद्धा पूर्वक नमन करती हैं ......... अपने उन सभी '' पूर्वजों '' , '' अग्रजों '' , '' बड़ों '' को .... जिन्होंने अपने खून पसीने से बरसों सींचकर '' सिंह सदन कुटुंब '' रूपी विशाल बाग़ को उसको आज के आकार तक पहुँचाया है .... अपने अपूर्व त्याग और बलिदान से ...... आने वाली नस्लों को एक बेहतर ज़िन्दगी का रास्ता दिखाया है ..... !


................आज इस अवसर पर हम सिंह सदन के ऐसे ही एक स्नेही..... त्यागी ..... शिल्पकार ..... हमारे '' मामा श्री '' श्रीकृष्ण के प्रति अपनी अपार श्रद्धा प्रकट करते हैं......... मामा श्री अपने नाम की सार्थकता सिद्ध करते हुए कुटुंब में स्नेह प्रेम और सहकार के अदभुत प्रतीक हैं ........ बड़ों से लेकर छोटों तक उनकी लोकप्रियता सिद्ध है !


उनके हंसमुख ...... प्रसन्नचित ..... आध्यात्मिक ..... और संतुष्ट स्वभाव के सभी कायल हैं ! मामा श्री ..... यही कोई छ: दशक पहले मैनपुरी के पावन '' मेदेपुर '' ग्राम में जन्मे ... बचपन से ही वे सहकारी ..... सामाजिक प्रवृत्ति के धनी हैं ...... हर सामाजिक - पारिवारिक दायित्व को .... उन्होंने पूरी शिद्दत.... पूरी जिम्मेदारी से निभाया है ... !

...................... उनके पिता ... यानी हमारे परम पूज्य नाना श्री एक महान आध्यात्मिक संत थे ...... मैनपुरी और आस पास के कई जनपदों में उनके संत स्वभाव ........ और '' आध्यात्मिक चिंतन '' की बड़ी गूँज थी ... वे सच्चे '' सिद्ध पुरुष '' थे ........... मामा श्री में एक '' महान आध्यात्मिक परंपरा के सिद्ध ऋषि के अंश '' होना .......... स्पष्टत: परिलक्षित होता है .. वे बच्चों बड़ों सभी के साथ बेहद आत्मीय और स्नेही हैं......... हमारे ऊपर तो उनके बड़े उपकार हैं वे बचपन से ही सही मायनों में हमारे '' संरक्षक '' रहे हैं ..........आज '' सिंह सदन '' की इमारत जो खड़ी है ........ उसकी बुनियाद हमारे मामाश्री के खून पसीने ......और उनके अथक परिश्रम से निर्मित है ........!


........हमारे लिए मीलों मील से ...... रोजाना कई कई बार साइकिल से आना - जाना हमे आज भी याद आता है...... आज भी हमे जब भी ....... जहाँ भी जरूरत हो ..... वे दौड़े चले आते हैं ..........! उनसे जुडी हजारों यादें आज भी हमारी आँखें नम कर देती हैं .. कैसे और किन शब्दों में उनको धन्यवाद दूं .............. मेरे पास शब्द नहीं है ......... सिर्फ भावनाएं हैं ................ उनके निर्दोष , निर्मल , कल्याणकारी व्यक्तित्व ने मेरी रूह को कितना प्रभावित और आकर्षित किया है ......... मैं बता नहीं सकता....... क्योंकि वाणी और शब्दों की अपनी सीमायें हैं........ और कुछ विषय वर्णनातीत होते हैं ....... !

..... बचपन में हम भाइयों के बाल मन पर........... तो मामाश्री के व्यक्तित्व का इतना गहरा प्रभाव था कि हमे पुरानी हिंदी फिल्मों के शानदार चरित्र अभिनेताओं - '' बलराज सहनी '' और '' नज़ीर हुसैन '' में बस अपने ...... प्यारे मामा ही नजर आते थे ........... आज भी हम भाई ''जोनी वाकर '' को अपने मामा के ही रूप में देखते हैं ........ मामाश्री का ऐसा '' अद्वितीय प्रभाव '' हम भाइयों पर बचपन से लेकर आज तक कायम है .....!

....... मामाश्री को बचपन से ही हम अनेकानेक रूपों में देखते रहे हैं ........ कभी वे मुझे एक बेहतरीन '' डिजाईनर दर्जी '' लगते थे तो कभी '' रिश्तों के गूढ़ ज्ञाता '' , '' कट्टर परम्परावादी '' ........... कभी वे '' प्यार का सागर '' लगते तो कभी '' वैरागी सन्यासी ''... मामाश्री ने हर रूप को पूरी शिद्दत से जिया है ....... हर इंसानी धर्म और पारिवारिक जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है .......... वे महान पिता ..... आज्ञाकारी पुत्र ...... अच्छे और सच्चे नागरिक के रूप में मीलों तक ...... एक '' उदाहरण '' के रूप में यूँ ही नहीं प्रस्तुत किये जाते हैं ...... कुदरत ने भी मानो उन पर कृपा बरसाई है ...... तभी तो उन्होंने एक '' महान माता - पिता '' के यहाँ जन्म लिया ...... और समाज को अगली पीढ़ी के रूप में चार अति संस्कार वान मर्यादित संताने दी .......!


.....'' सिंह सदन '' के इस ..... '' महान ट्रस्टी ''.... '' कर्मयोगी संरक्षक '' .... और '' सिंह सदन कुटुंब '' रुपी बगिया के त्यागी - तपस्वी ....'' धर्मनिष्ठ माली '' को हमारा सादर नमन ! !


PANKAJ K. SINGH For '' TARRUF ''