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Saturday, February 18, 2012


राग दरबार – vol-5

ऊँचे ओहदे दुनियां पीछे |
ऑंखें मीचे  आँखे मीचे ||

पैसे में है सारी ताकत ||
कौन है ऊपर कौन है नीचे ||

फर्क अमीरी और गरीबी |
एक चांदनी एक गलीचे ||

फूटी कौड़ी पास नहीं है |
जीवन काटा मुटठी भीचे ||

अपनी किस्मत में है बंजर |
तुम्हे मुबारक बाग बगीचे ||

Saturday, January 28, 2012

प्रिय पाठकों ..आज के इस कॉलम ''राग दरबार'' में देश के जाने माने गीतकार पुष्पेन्द्र सिंह पेश कर रहे हैं एक हसीन नज़्म ! इस नज़्म में गीतकार पुष्पेन्द्र सिंह ने रूमानियत की सारी हदों को पार कर दिया है .. आप स्वयं पढ़ें और उन जज्बातों का एहसास करें .... संपादक

राग दरबार – vol-1
प्रिय पाठकों
यह मेरी ताज़ा तरीन रचना है इस रचना के बारे में मै आपको एक खास बात बताना चाहूँगा जब मैंने ये गज़ल लिखी तो मात्र ३० मिनट में मैंने ऊपर के तीन शेर लिख लिए किन्तु आगे
मुझे इस बहर और वजन के शब्द नहीं मिल रहे थे ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ मैंने बहुत कोशिश  की किन्तु कामयाब नहीं हुआ फिर मैने आदर्णीय गुरुदेव पवन भैया से विचर विमर्श किया और उन्हें ये गजल सुनाई तो उन्हों ने इस गज़ल को पूरा करने में पूरा सहयोग किया मै उनका आभारी हूँ |
और ये पूरी गज़ल मै श्रद्धेय गुरुदेव के श्री चरणों में समर्पित करता हूँ |

प्यार बफा की बातें झूठी लगती है |
खुशियों की सौगातें झूठी लगती है ||

जब से तुमको देखा है इन आँखों ने |
सारी   सारी रातें   झूठी लगती  है ||

कहते है जब जुदा हुए तो तुम रोये  |
वे  मौसम  बरसातें  झूठी लगती है ||

बिन तेरे ऐ चंदा मामा सूरज को |
तारों की बारातें झूठी लगती है ||

इश्क की राहों से जो हंस कर गुजर गया |
चौसर की सब मातें झूठी लगती है ||

जो करना है आज ही कर लो |
कल की सब शुरुआतें झूठी लगती है ||