नॉएडा से जब चंदौली चला था तो इस शहर की तस्वीर बहुत साफ़ नहीं थी ......!
मगर नयी चुनौतियों से घबराना कभी मेरे मिजाज़ का हिस्सा नहीं रहा, सो
यहाँ एकदम नवीन और अपरिचित परिस्थितयां होने के बावजूद मुझे चंदौली में
कुछ कर गुजरने का हौसला मिलता रहा.
अकेलेपन से कहीं बोर न हो जाऊं इसलिए
साथ में बोबी लाला नोयडा से मेरे साथ ही यहाँ आये थे . शुरूआती दो तीन
दिन गेस्ट हॉउस में गुज़ारने के बाद हम अपने बंगले में शिफ्ट हो गए . जब
चंदौली आया तो लगा कि बहुत दूर आ गया हूँ, यह भी लगा कि दूरी के कारण अब
घर के लोग यहाँ शायद ही आयेंगे ..... मगर इस भरम को टूटने में बहुत वक्त
नहीं लगा. महज दो सप्ताह के इस अंतराल में ही बदायूं से मित्र कौशल नीरज
का आगमन हुआ, फ़िलहाल चुनार में तैनात राजकुमार भाईसाहब भी एक दिन रुक कर
गए...... बालसखा संजीव गोयल भी इलाहबाद से आये और एक रविवार खर्च कर वापस
हुए. इन सबके साथ बड़ा अच्छा वक्त गुज़रा.


सबसे आनन्द तो तब आया जब तीन
दिन पहले नोयडा से पंकज यहाँ आये और उनके साथ पिंटू भी कानपुर से चले आये
. इन दोनों के साथ तीन चार दिन कब फुर्र हो गए पता ही नहीं चला..... कमी
तो तब खली जब पिंटू को रेलवे स्टेशन पर और पंकज को एयर पोर्ट से विदा
करके लौटा. वाकई अच्छे पल कितनी जल्दी गुज़र जाते हैं..... पंकज और पिंटू
के साथ देर रात तक गप-शप करना, तमाम पहलुओं पर कभी गंभीर तो कभी मजाकिया
लहजे में बात करने का अपना ही मज़ा होता है. उनके वापस जाने के बाद शिद्दत
से उन्हें मिस कर रहा हूँ. उनके साथ बिताये पलों को अब तक याद कर रहा हूँ.
अभी तक अंजू ईशी लीची नहीं आये हैं.... इस सप्ताह वो भी आ जायेंगे.....!
आगे उम्मीद करूँगा कि सिंह सदन के सभी सदस्य गाहे बगाहे यहाँ आते रहें और
अपने प्यार की शम्मा से इस घर को जगमगाते रहें....!
***** PK