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Monday, May 14, 2012

मुरादाबाद स्थित पुलिस ट्रेनिंग एकेडेमी में.....

एक दिन श्यामू के साथ 

इस रविवार को अपने प्रिय श्यामू से मिलने हम लोग पहुँच गए उनके मुरादाबाद स्थित पुलिस ट्रेनिंग एकेडेमी में ! मेरे साथ माता श्री के अलावा चिंटू और हमारे सहयोगी गुड्डू भी थे ! एक दिन के इस छोटे से मिलन में सभी को बेहद ख़ुशी मिली !प्रिय श्यामू  ने हमें  मुरादाबाद स्थित पुलिस ट्रेनिंग एकेडेमी का एक एक कोना दिखा डाला और यहाँ के रूटीन और वातावरण से भी अवगत कराया यहाँ का वातावरण बेहद अनुशाषित दिखा और युवा अधिकारी खासे  परिश्रमी दिखे !लौटते समय अहसास हुआ की हमारा प्यारा बच्चा श्यामू अब एक समज्ग्दार और संवेदनशील युवक हो गया है उसे प्यार कर नाम आँखों के साथ हम विदा हुए !आप भी एक नज़र डालिए मुरादाबाद स्थित पुलिस ट्रेनिंग एकेडेमी के रंग ढंग पर ---














***** PRESENTED BY PANKAJ K. SINGH

Friday, May 4, 2012

महफ़िल......!


हफ़िल की इस कड़ी में आज स्वागत कीजिये हृदेश  जी का...... हृदेश जी को संगीत की समझ काफी गहरी है. पत्रकारिता के दौरान  वे कई इन्टरनेट चैनलों के लिए भी  संगीत समीक्षा करते रहे हैं. उनका संगीत प्रेम सिंह सदन के अन्य  सदस्यों की पसंद से काफी भिन्न है. वे संगीत की सूफियाना धारा से ताल्लुक रखते है. रहस्यवादी (मिस्टिक ) संगीत को वे काफी पसंद करते हैं. क्लासिकल संगीत में भी उनकी रूचि है. उनके पसंदीदा गायक सुखविंदर, नुसरत फ़तेह अली खान, वडाली बन्धु, कैलाश खेर, रेखा भारद्वाज, उस्ताद सुलतान खान और राहत फ़तेह अली खान हैं. उनकी पसंद की बात करें तो वो नुसरत  फ़तेह अली खान का वो गीत है जिसके बोल हैं " तू इक गोरख धंधा है.....,    ". यानी खुदा तुम एक पहेली हो......!  यह गीत रहस्यवाद की परतें खोलता है. यह गीत नाज़ ख्यालवी (1947-2010)  ने लिखा है. यूँ तो नाज़ ख्यालवी एक रेडियो ब्रोडकास्टर थे मगर इस एक गीत को नुसरत ने कुछ इस तरह गाया कि नाज़ ख्यालवी दुनिया भर में लोकप्रिय हो गए.......  गीतकार ने लिखा है कि ----

हर ज़ुल्म की तौफीक है ज़ालिम की विरासत
मजबूर के हिस्से में तसल्ली न दिलासा
कल ताज सजा देखा था जिस शख्स के सर पर
है आज उसी के हाथों में ही कासा 
ये क्या है अगर पूछूं तो कहते हो जवाबन
इस राज़ से हो सकता नहीं कोई 
.............तुम ही अपना पर्दा हो
.............तुम इक गोरखधंदा हो. 
*** कासा (भिक्षा पात्र) 
     शनासा ( समबन्धित) 
"खुदा को महसूस करना है तो इस गीत को ज़रूर सुनें...."

नुसरत ने इसे जिस तरह गया है उससे साबित होता है की दुनिया में उनसे बड़ा और महान कव्वाल कोई नही..... आइये डूबिये -इतराइए नुसरत के सुरों में  और महसूस करिए खुदा के रंग! आईये सुनते हैं इस गीत को जिसमें ख़ुदा के अस्तित्व की पहचान को नए रंगों में रंग   गया है......! 

Wednesday, May 2, 2012

समस्या हल ----18


प्रिय मित्रों ....
इस बेमिसाल चित्र को ध्यान से देखिये ... क्यों हैरत में पड गए ना .. वाकई समझ में नहीं आ रहा की आखिर ऐसा क्या है इस दरख्वास्त में की उसे देखकर यह दिग्गज जोड़ी भी अवाक रह गयी है ... तो जरा दिमाग पर जोर डालिए और बताइए की आखिर क्या छुपा है इस पत्र में .. बेहतरीन जवाबों को पुरस्कृत किया जायेगा ! 






****** PRESENTED BY  SINGH SADAN  KNOWLEDGE COMMISSION 

तेरे आने की जब खबर महके....!

नॉएडा से जब चंदौली चला था तो इस शहर की तस्वीर बहुत साफ़ नहीं थी ......! मगर नयी चुनौतियों से घबराना कभी मेरे मिजाज़ का हिस्सा नहीं रहा, सो यहाँ  एकदम नवीन और अपरिचित परिस्थितयां  होने के बावजूद मुझे चंदौली में कुछ कर गुजरने का हौसला मिलता रहा. 

अकेलेपन से कहीं बोर न हो जाऊं इसलिए साथ में बोबी लाला नोयडा से  मेरे साथ ही यहाँ आये थे . शुरूआती दो तीन दिन गेस्ट हॉउस में गुज़ारने  के बाद हम अपने बंगले में शिफ्ट हो गए . जब चंदौली आया तो लगा कि बहुत दूर आ गया हूँ, यह भी लगा कि दूरी के कारण अब घर के लोग यहाँ शायद ही आयेंगे ..... मगर इस भरम को टूटने में बहुत वक्त नहीं लगा. महज दो सप्ताह के इस अंतराल में ही बदायूं से मित्र कौशल नीरज का आगमन हुआ, फ़िलहाल चुनार में तैनात राजकुमार भाईसाहब भी एक दिन रुक कर गए......  बालसखा संजीव गोयल भी इलाहबाद से आये और एक रविवार खर्च कर वापस हुए. इन सबके साथ बड़ा अच्छा वक्त गुज़रा. 

सबसे आनन्द  तो तब आया जब तीन दिन पहले नोयडा से पंकज यहाँ आये और उनके साथ पिंटू भी कानपुर से चले आये . इन दोनों के साथ तीन चार दिन कब फुर्र हो गए पता ही नहीं चला..... कमी तो तब खली जब पिंटू  को रेलवे स्टेशन  पर और पंकज को एयर पोर्ट से विदा करके लौटा. वाकई अच्छे पल कितनी जल्दी गुज़र जाते हैं..... पंकज और पिंटू के साथ देर रात तक गप-शप करना, तमाम पहलुओं पर कभी गंभीर तो कभी  मजाकिया लहजे में बात करने का अपना ही मज़ा होता है. उनके वापस जाने के बाद शिद्दत से उन्हें मिस कर रहा हूँ. उनके साथ बिताये पलों को अब तक याद कर रहा हूँ.  



अभी तक अंजू ईशी लीची नहीं आये हैं.... इस सप्ताह वो भी आ जायेंगे.....! आगे उम्मीद करूँगा कि सिंह सदन के सभी सदस्य गाहे बगाहे यहाँ आते रहें और अपने प्यार की शम्मा से इस घर को जगमगाते रहें....!

***** PK

Monday, April 30, 2012

SINGH SADAN HALL OF FAME ....

VOLUME-- 21


LIFE IN CHANDAULI.....


अब कुछ बागबानी भी हो जाए...

भगवान् तुम्हारे चरणों में...

इधर तो हरियाली है 

अधिकारी हैं तो क्या हुआ... किसनई   तो करनी होगी 

....... अमले के साथ बिहार बोर्डर पर 

जिलाधिकारी बंगले पर 

अच्छा तो अब जरा दौरे  पर निकलता हूँ....

व्यवस्था चौकस बा .......

भैया ... हमार दर्खास्तिया पे तनिक गौर लेक बा ..

राउया जिला माँ आप का हम फौजिन की तरफ से स्वागत बा .. 

हर काम दुरुस्त और जनता खुश 

एक बंगला बना न्यारा .....

राउया गाड़िया माँ बैठल बानी ...

चंद लम्हे फुर्सत के ...

क्लीन एंड ग्रीन हाउस ..

देखो ... हर जगह हर कोना चमकना चाहिए .. समझे .. जी मालिक 

दो शेरों का जोड़ा मिल गया रे.. 

कुछ पेट पूजा भी हो जाये .....

डी ऍम साहब व्यस्त है ...

मौसम तो ठीक लग रहा है ...

जरा पानी वानी पी लिया जाये ......

Saturday, April 28, 2012

तेरी याद आयेगी आती रहेगी ........!!!!!!!!!

shyamkant

ज हाज़िर है महफ़िल की नई कड़ी....... आज हाज़िर हैं हम , अपने ब्लॉग के उप सम्पादक और उदीयमान गीतकार/ शायर पुष्पेन्द्र पुष्प के प्रिय गीत को लेकर.  पुष्पेन्द्र  सिंह उन गीतों को पसंद करते हैं जिनमे संवेदनशीलता हो...... शायद इसीलिए  जगजीत सिंह की गयी ग़ज़लों को वे बेहद पसंद करते हैं. लता जी के पुराने गीत वे गुनगुनाते रहते हैं. कुमार शानू और हरिहरन उनके प्रिय गायक हैं. गीतकारों में गुलज़ार साहब और जावेद अख्तर को पढना सुनना उनका शगल है.


आज उनके संगीत प्रेम की चर्चा में उनके  प्रिय गीत पर नज़र डालते हैं. उन्हें यूँ तो कई गाने-ग़ज़लें पसंद हैं मसलन...... चिट्ठी न कोई सन्देश, जगजीत सिंह की ग़ज़ल कोई फ़रियाद दिल में उठी हो जैसे..... इत्यादि . मगर उनके सर्वाधिक प्रिय गीत की बात करें तो वो है.......निर्देशक जे पी दत्ता  की फिल्म 'रिफ्यूजी' (2000) का. गाने के बोल हैं "पंछी  नदिया पवन के झोंके, कोई सरहद  न इन्हें रोके........" . इस गीत को सोनू निगम और अलका याग्निक ने गाया था. लिखा था जावेद अख्तर साहब ने और संगीत था अनु मालिक का. इस गीत के बोल वाकई बहुत खूबसूरत हैं..... गीतकार ने प्रकृति के प्रतीकों  के माध्यम से दो भौगोलिक सीमाओं के बीच के रिश्तों को समझाने का प्रयास किया है. यह गीत बहुत ही मार्मिक- भावनात्मक- और सन्देश प्रद है. इस गीत  को बहुत प्रसिद्धि मिली........  श्रेष्ठ संगीतकार और गीतकार का राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला. इस गीत को 2001 का बेस्ट मेल और फीमेल सिंगर का फिल्मफेयर का अवार्ड मिला. जावेद अख्तर को इस गीत के लिए फिल्मफेयर अवार्ड मिला. 

आइये गुनगुनाते हैं इस गीत  को.......

"यह गीत अपने कर्णप्रिय संगीत....मधुर  गायकी और अर्थपूर्ण बोलों के लिए हमेशा सुना जाता रहेगा"------- पुष्पेन्द्र पुष्प 


***** PK