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Sunday, February 5, 2012

दिल ढूंढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन .....

सिंह सदन : एक निर्मल स्थल 
दो भाई: एक और एक ग्यारह 
सिंह सदन :एक जांबाज़ लश्कर 
ममता की छाँव में 
जानशीन :सिंह सदन के शेर और शेरा  
आओ कुछ बातें हो जाएँ ....

संगम: सिंह सदन की तीन पीढियां एक साथ

***** PRESENTED BY PANKAJ K. SINGH 

COMPREHENSIVE PERSONALITY TEST REPORT CARD 2012

अंतरराष्ट्रीय मुशायरे में मुख्य अतिथि  अंजू भाभी श्री के साथ  प्रिया .....

volume- 30


प्रिया सिंह ....

 प्रिया ने इतने कम समय में जिस तरह अपने आप को स्थापित किया है ....  वह बड़ी बात है ! वे एक अच्छी पत्नी, अच्छी माँ और बहू है |
                                  ........पुष्पेन्द्र सिंह ''पुष्प " (जाने- माने गीतकार एवं एसोसियेट एडिटर CPTR-2012 )


 भाभी   जहां खड़ी हो जाती हैं तो बस वही  जमती हैं.... वे सिंह सदन के हर एक  सदस्य का ध्यान रखती हैं....!! 
                                              ......श्याम कान्त ( सुपर कॉप एवं मशहूर पेंटर )  
  
  प्रिया एक साफ़ मन की मेहनती और गुणवान वधु हैं .... उचित  ही  ''सिंह सदन'' ने उनका चुनाव किया है! वे सिंह सदन की रौनक जो ठहरीं !                           .                                  
                    ........ पंकज के .सिंह ( एडिटर,CPTR-2012,क्रिकेटर एवं फिल्म क्रिटिक )

  प्रिया ''सिंह सदन'' की गरिमा  और ख्याति को और बढ़ाएंगी.... ऐसा मेरा पूर्ण विश्वास है! 
                                         ----ह्रदेश के सिंह  (जाने माने लेखक, पत्रकार और संपादक ) 
   
प्रिया एक सुशिक्षित और प्रगतिशील नारी हैं !उनका गृह संचालन उच्च कोटि का है ! 
                                          ----श्री पवन कुमार ( प्रख्यात प्रशासक, चिन्तक, लेखक एवं शायर )

 प्रिया सभी को साथ लेकर चलने वाली हंसमुख और प्यारी बच्ची है !
                                            ..............श्रीमती शीला देवी (जानी- मानी पाक कला विशेषज्ञ एवं सिंह सदन सुप्रीमो)

  प्रिया ''सिंह सदन'' की  बेहद खुबसूरत ,मेहनती और गुणवान वधु ही नहीं.... प्यारी बेटी भी हैं !
                                 .............श्रीमती अंजू सिंह ( ख्याति प्राप्त इंटीरियर डिजायनर )  
                      
              तो साथियों आइये आज मिलते हैं सिंह सदन की प्यारी -दुलारी , हर दिल अज़ीज़  ...प्रिया सिंह से ...

COMPREHENSIVE PERSONALITY TEST REPORT CARD OF MRS.PRIYA SINGH      ....

  • 1. व्यक्तित्व ** 2.65
  • 2. रिश्तों में मर्यादा एवं उत्तरदायित्व की भावना * * 2.25
  • ३. जीवन मूल्यों के प्रति आग्रह * * 2.0
  • ४. भौतिक उपलब्धियां * *2.10
  • ५. लोक जीवन एवं सार्वजनिक छवि * * 1.75
  • ६. स्वास्थ्य एवं अनुशासन * * 1.75
  • ७. जीवन में आध्यात्मिकता एवं चिंतन शीलता * 1.50
  • ८ . सत्य का अनुश्रवण एवं सत्य का साथ देने की क्षमता * 1 80
  • ९. जनहित एवं सेवा भावना * 1.55
  • १०. आत्मविश्वास एवं प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने की क्षमता * * 2.00
  • ११. निर्विकार एवं निर्दोषता * * 2.10
  • १२. जिज्ञासु एवं नित नया सीखने की ललक * 2.10
  • १३. रचनात्मकता * 2.80
  • १४. वाक् निपुणता एवं भाषण शैली * 2 .75
  • १५ .आत्म द्रष्टि एवं दूरद्रष्टि * 2.05
  • १६. साहस एवं निर्भीकता * 1.90
  • १७. सिंह सदन के गौरव को बढ़ाने में योगदान * 1.80
  • १८. अन्य सदस्यों को प्रेरित करने की नेतृत्व क्षमता * 1.90
  • १९. प्रगतिशील द्रष्टिकोण एवं निरंतर प्रगति की ललक * 2.50
  • २०. निस्वार्थ एवं कपट रहित जीवन * 2.00
  •                                      TOTAL SCORE IS ..... 41.25
      • STATUS REPORT- प्रिया के अन्दर काफी  खूबियाँ  हैं.... उन्होंने   अपनी         जिम्मेदारियों को बेहतर ढंग   से   निभाया   है ! कोई    शक   नहीं की वे धीरे धीरे सिंह सदन की अहम् 
        • जिम्मेदारियों को आगे और विस्तार देंगी !
        • धीरे
                         
      • RATING ---  **** 3.5  STAR    
      • NEGATIVE FACTOR--  बचपन की उम्र है ! लाड- प्यार में पली होने के कारण थोड़ी उतावली और जल्दबाज़ हैं ! थोड़ी गहराई और गंभीरता की जरुरत है ! बातों को पचाने के लिए और अधिक सजग रहने की आवश्यकता है !अति उपभोक्तावादी और भौतिकतावादी द्रष्टिकोण से भी बचने की 
          • जरुरत है!
           
      • MODEL --- शर्मीला टैगोर , तनूजा !    
      • *****PRESENTED BY  PANKAJ K. SINGH(EDITOR,CPTR-2012) & PUSHPENDRA SINGH (ASSOCIATE EDITOR, CPTR- 2012)

सिंह सदन का क्रिकेट प्रेम

                                                   
                                             सिंह सदन के युवा सदस्य क्रिकेट फीवर से   हमेशा  से ग्रस्त रहे हैं. यूँ  तो सिंह -सदन की पहली-दूसरी पीढ़ी में क्रिकेट या यूँ  कहिए कि किसी भी खेल के प्रति रूचि नहीं रही लेकिन हमारी पीढ़ी में क्रिकेट का ऐसा शौक लगा कि हम सब क्रिकेट से हमेशा  जुड़े रहे.

क्रिकेट के प्रति लगाव की शुरूआत... 
                                                     क्रिकेट के प्रति लगाव की शुरूआत होती है 1983-84 सीजन से ....... मैं और पंकज अचलगंज में पढ़ते थे. अचलगंज वैसे तो छोटा कस्बा था लेकिन क्रिकेट के प्रति यहां के युवाओं में काफी दीवानगी थी. हमारे कुछ स्कूली मित्र और आस-पास रहने वाले मित्रों को क्रिकेट का शौक  था .........उन्हीं के साथ हम सब भी क्रिकेट खेलने लगे. उन दिनों हमारे क्रिकेटर साथी पिंटू,कमल, मंगू, तूते   आदि थे. पंकज जहां तेज गेंदबाजी और आक्रामक बैटिंग के लिए पहचान बना रहे थे वहीं मैं टिकाऊ बल्लेबाज और कामचलाऊ गेंदबाज की हैसियत से पहचाने जाने की जद्दोजहद में था.
   
                                                       समय बीता, हम मैनपुरी आ गए.  मैनपुरी में क्रिकेट के साथ ऐसा रिश्ता  जुड़ा  कि आज तक जारी है. मैनपुरी राजा का बाग में जब हमारा घर बना तो पूरा का पूरा इलाका खुला फील्ड था........ कहीं भी ईंटो का स्टम्प बनाया और सामान्य लकड़ी के बेटे के साथ कोर्क  की बाल  .... खेल शुरू .......  इस दौरान मुकेश , टोनी, असलम, हरिओम, संजय आदि लोग साथ आ गए.
                                                   
पंकज ने  क्रिकेट जगत में  ’स्पीड  स्टार ’ का दर्जा हासिल किया.....
                                                 मेरा लगाव स्थानीय क्रिकेट तक ही सीमित रहा.  राजा का बाग इलेविन का मैं कप्तान रहा, हमारी टीम  जबरदस्त परफारमेंश  भी देती रही. जैसा की मैंने लिखा कि मेरा क्रिकेट प्रेम तो स्कूल-मोहल्ले तक सीमित रहा लेकिन पंकज ने अपने क्रिकेट प्रेम को और परवान चढ़ाया. आठवीं-नौवी कक्षा तक आते आते वे स्टेडियम में प्रेक्टिस करने लगे.
                                                     इमरान खान को अपना आदर्श  माने वाले पंकज ने तेज बालिंग  में ’स्पीड  स्टार  का दर्जा हासिल किया और दो साल तक उनकी तेजी का कहर मैनपुरी के क्रिकेट जगत में गंूजता रहा। इसी बीच वे वीनू मांकड ट्राफी खेलने आगरा गए जहां उन्होंने धांसू बाॅलिंग कर काफी वाहवाही लूटी. उनकी प्रतिबद्वता का आलम यह था कि वे रोजाना सुवह-शाम स्टेडियम जाते और आठ -दस घण्टे की नेट प्रेक्टिस करते.
       

 श्यामकांत: आलराउण्डर  के सारे गुण
                                                            इसी बीच श्यामकांत, अमित ने क्रिकेट से नाता जोड़ा. श्यामकांत बाएं हाथ के तेज गति के गेंदबाज और शानदार बल्लेबाज रहे. आलराउण्डर होने के सारे गुण उनमें मौजूद थे, उन्होंने भी वीनू मांकड ट्राफी में शानदार प्रदर्शन  किया. मथुरा के विरूद्व उनका बालिंग प्रदर्शन   ऐसा था कि बड़े बड़े बल्लेबाज उनकी बाल के सामने पानी मांग गए...... ट्राफी में वे बेस्ट बालर चुने गए. सिंह सदन के ही एक और हीरा  अमित (चिंटू) के रूप में सामने आया जिसने  बल्लेबाजी में अपना जौहर दिखाया. राजा का बाग इलेविन की कप्तानी और उप कप्तानी करते हुए श्यामू -चिंटू की जोड़ी में अपनी दबंगई जारी रखी.
                                                       
जोनी : खेल  कम ....सेंस आफ ह्रयूमर  ज्यादा
                                        जोनी का क्रिकेट प्रेम अंग्रेज खिलाडि़यों की तरह रहा. वे फ़ील्ड में अपने हास परिहास तथा मनोरंजक कमेण्ट और हास्यस्पद मनोभावों को प्रदर्शित  करने के लिए जाने जाते रहे. मैदान में उनकी उपस्थित खेल के लिए कम सेंस आफ ह्रयूमर के लिए ज्यादा रहती थी.

                                                          गाँव -देहात में अपने क्रिकेट प्रेम के लिए पुष्पेन्द्र/टिंकू  काफी जाने जाते रहे. पुष्पेन्द्र ने तो बाकायदा मेदेपुर ग्राम की टीम बनाकर अपने नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन  किया. उनकी टीम ने समीपवर्ती गाँवों यथा बिटुकिया ने नगला, जागीर, चैहानपुरा, निजामपुरा आदि की टीमों को चित्त किया.
                                                       
                                                           गुरूदेव प्रमोद ’रत्न’ का क्रिकेट प्रेम वंडर ब्यॉय  अजहरूद्दीन की  गिरफ्त में रहा.

’सिंह सदन प्रीमियर लीग’...... 
                                                          वर्तमान में ’सिंह सदन प्रीमियर लीग’ भी अपने आयोजन, खिलाड़ियों की नीलामी और रोमांचकता के लिए जानी  जा रही है . अब तक इस लीग के दो सत्र आयोजित किए जा चुके हैं पूरे मैनपुरी विशेष कर राजा बाग में इस प्रीमियर लीग को लेकर जबरदस्त उत्साह रहता है.
                                                       तकरीबन 8 टीमें  इसमें हिस्सा लेती हैं और इस आयोजन को बड़े शानदार तरीके से कारया जाता है. लीग के प्रथम सत्र में अप्रत्याशित रूप से दिलीप की टीम और दूसरे लीग में कोच्ची रिटर्न्स के रूप में मेरी टीम विजेता रही थी. इसके अलावा बिट्टू, सचिव जैसे युवा जो खेलने से ज्यादा प्रबन्धन (मैनेजमेन्ट) में रूचि रखते है, वे इस आयोजन को सफल बनाते है.
                                                        दुआ कीजिये ....सिंह सदन का क्रिकेट प्रेम यूँ ही परवान चढ़ता रहे........

***** PK

Saturday, February 4, 2012


राग दरबार - vol - 2
लोरी गीत .................

बच्चा- मुझे लोरी सुनाओ मात मुझे निदिया न आये


माँ- मेरे प्यारे मोहन आओ तुम्हें लोरी सुनाऊं
माता जी का वीणा बाजे नारद की कड़ताल
सो जाये ये धरती अम्बर सो जाये पाताल
मेरे प्यारे मोहन आओ तुम्हें लोरी सुनाऊं .......१

विष्णु जी का शंख नाद हो शिवजी डमरू  बजाए
सुन कर सारी इन्द्र लोक की परियां दौड़ीं आएं
मेरे प्यारे मोहन आओ तुम्हें लोरी सुनाऊं .........२

बच्चा- मुझे लोरी सुनाओ मात मुझे निदिया न आये
आँचल की तेरे छाया हो माँ सर पर तेरा हाथ
वाणी से तेरी अमृत बरसे निदिया भी है साथ .....३

मेरे प्यारे मोहन आओ तुम्हें लोरी सुनाऊं ...

मेरी प्यारी मैया अब तो मुझे निदिया सताए ...
मेरे प्यारे मोहन आओ तुम्हें लोरी सुनाऊं ....

Friday, February 3, 2012

स्ट्रेट ड्राइव !

VOLUME --5

एक रूहानी अहसास ... चंदामामा 

अपनी फेवरेट लिस्ट से मैं आज उठा के लाया हूँ अपनी  प्यारी पत्रिका''चंदामामा'' को !

                                   ''चंदामामा'' बच्चों से लेकर बड़ों तक को समान रूप से भाती है! कई दशकों से नैतिक, चारित्रिक और बौद्धिक  शिक्षा प्रदान करने वाली सुन्दर कथा -कहानियों को हमें सुनाती आ रही है हमारी प्यारी पत्रिका ''चंदामामा'' ! मैं आपको बता नहीं सकता की इस प्यारी पत्रिका चंदामामा से मुझे किस हद तक मोहब्बत रही है !

''चंदामामा'' एक... रूप अनेक 
                                      ५ साल की उम्र से लेकर अब तक  चंदामामा के आकर्षण में मैं पूरी तरह डूबा हुआ हूँ ! इसकी मन मोह लेने वाली सुन्दर कथा- कहानियों को पढ़कर ही मेरे जैसे इस देश के करोड़ों बच्चे बढे हुयें हैं!
                                        चंदामामा ने मेरे लिए एक दादा- दादी, नाना- नानी ,शिक्षक और मित्र... मानो सभी भूमिकाएं एक साथ निभा दी !

स्वयं में एक संस्थान  है.....
                                                करोड़ों भारतीयों  में   कई दशकों से नैतिक ,चारित्रिक और बौद्धिक  शिक्षा के अंकुर रोपने का कार्य इस महान पत्रिका चंदामामा ने ही किया है! वास्तव में हमारी प्यारी पत्रिका ''चंदामामा'' मात्र एक  पत्रिका नहीं है... वरन यह  स्वयं में एक संस्थान  है ....यूनिवर्सिटी है!

राही तू मत रुक जाना ....
                                        चंदामामा का पहला  अंक   1947 में प्रकाशित  हुआ था !  इसके संस्थापक संपादक बी नागी रेड्डी थे ..जो साऊथ के जाने माने फिल्म निर्माता भी रहे हैं !
                                        शुरू में यह तमिल और तेलगु में ही प्रकाशित होती थी बाद में १९४९ में चंदामामा कन्नड़ और हिंदी में  प्रकाशित होनी  शुरू हो गयी !१९५६ तक चंदामामा के मलयालम सिन्धी अंग्रेजी उड़िया  गुजरती और मराठी संस्करण भी  प्रकाशित होने   शुरू हो गए थे !
                                        ७० के दशक में चंदामामा के बंगाली ,पंजाबी और असामी संस्करण भी  प्रकाशित होने   शुरू हो गए थे !

कुछ मुश्किलों का दौर...... 
                                                     १९९८ में मजदुर विवादों के कारण चंदामामा का प्रकाशन रुक गया था जो एक वर्ष बाद पुनः चालू हो गया !अब  चंदामामा ने भी वक्त के साथ ताल मेल बिठाते हुए खुद को नए रूप रंग में ढाल लिया है ! 

नए  युग में प्रवेश ....
                                                         अब इसे काफी हद तक डिजिटल बना दिया गया है !२००७ में चंदामामा  ऑन लाइन भी हो लिया !इसके स्तंभों भी थोडा बहुत बदलाव किया गया है और इसमें आज के बच्चों को ध्यान में रखते हुए विज्ञान और तकनीक के विषयों को भी शामिल कर लिया गया है !

चंदामामा  की सबसे बड़ी खासियत .....
                                                          चंदामामा  की सबसे बड़ी खासियत रही है इसका बेमिसाल चित्रांकन !इसके चित्र इस कदर नयनाभिराम होते हैं की उनसे नज़र हटाना मुश्किल हो जाता है ! आपको कथा के ही युग में पहुंचा देने का कार्य करते हैं ये चित्र!
                                                       बेहतरीन भाव भंगिमाएं सुन्दर प्राकृतिक वातावरण एक पवित्रता को मुकम्मल अहसास करा देते हैं चंदामामा के   ये मनोहारी  चित्र ! प्राचीन भारत के राजाओं ऋषियों और नागरिकों के वस्त्र- आभुसड़ो को बेहद आकर्षक चित्रण चंदामामा के   ये मनोहारी  चित्र प्रस्तुत करते हैं !

दूसरी  सबसे बड़ी खासियत.....
                                     चंदामामा  की दूसरी  सबसे बड़ी खासियत रही है इसकी बेहतरीन सुसंस्कृत भाषा ! इसकी भाषा पढ़कर  ही मेरे  जैसे लाखों पाठकों ने अपने भाषा ज्ञान को शुद्ध और परिष्कृत किया है !
                                       विक्रम बेताल की कहानियाँ अपने अद्भुत भाषा विन्यास के कारण ही इस युग में  भारतीय संस्कृति सभ्यता और सुसंस्कृत भाषा की अमूल्य धरोहर बनी हुयी हैं ! 

बेहतरीन स्ट्रेस बस्टर...
                                                                 आज भी मेरे पास चंदामामा के २०० से ज्यादा अंक सुरक्षित रखे हुए हैं ...जो मुझे एक अनोखे शांत वातावरण में ले जाने का काम करते हैं !आज के इस अंधे भाग- दौड़ वाले युग में चंदामामा  करोड़ों पाठकों के लिए बेहतरीन स्ट्रेस बस्टर का काम तो कर ही रही है.... ये हमें हमारी सम्रद्ध भारतीय संस्कृति से भी जोड़े रखती है ! 

भारतीय संस्कृति- सभ्यता और सुसंस्कृत भाषा की एक  अमूल्य धरोहर...
                                                                     चंदामामा ने भारतीय संस्कृति सभ्यता और सुसंस्कृत भाषा के उन्नयन के लिए जो कार्य किया है उसके लिए हम सदैव के लिए  चंदामामा के ऋणी रहेंगे !
                                                                     यह हमारा परम दायित्व है की हम  भारतीय संस्कृति- सभ्यता और सुसंस्कृत भाषा की इस अमूल्य धरोहर को आधुनिकता और उपभोक्तावाद की आंधी से बचा कर रखें अन्यथा हम  भारतीय संस्कृति ,सभ्यता और सुसंस्कृत भाषा के बिखराव के सबसे क्रूर उत्तरदायी सिद्ध होंगे !

* * * * *PANKAJ K.SINGH


Thursday, February 2, 2012

रावण!रावण!रावण!

रावण के बारे में आप सभी लोग पर्याप्त ज्ञान रखतेहैं !
वह सदेव कुछ नया करने की कोशिश में रहता था
पर क्या आपको पता है कि रावण अपने समय से कई गुना आगे था
वह तीन ऐसे मुद्दों पर गहन मंथन कर रहा था ,
जिन  पर आज तीव्र बहस चल रही है
क्या आपको पता हैअगर नहीं तो
सोचिये !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
दिमाग पर जोर डालिए
और सारे ग्रन्थ पलट के देखिये
तो शायद आपको जवाब मिल जायेगा
कदम्ब रामायण में एक जगह रावण अपने अंत से पूर्व
भगवान् राम से इस बात का जिक्र करता है
और विभीषण को भी इस बावत आगाह करता है
                      अब सोचने वाली बात ये है कि क्या ये आज के दौर में पूरे हो पाए
जहाँ तक म्रतुन्जय का प्रश्न है आज के दौर में क्लोनिंग जैसे प्रयास हुए
पर ये मौत पर पूरी तरह विजय नहीं पाते !
दूसरा समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाने के प्रयास हुए ,
सफल भी रहे पर महंगे होने के कारण पूरी तरह लागू न हो सके
भारत में लक्षदीप के कवरत्ती नमक स्थान पर समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाया गया है
तीसरा प्रश्न तो आज सबसे बड़ा प्रश्न बना हुआ है
कि किस तरह सूर्य को उर्जा रूप में हम प्रयोग कर सकें
अब बताओ है न रावण कि सोच कई गुना आगे
श्यामकांत

Wednesday, February 1, 2012

स्ट्रेट ड्राइव..


VOLUME--5


       WHY THIS WORLD NEEDS A PHANTOM  


                                                         १७ फरबरी 1936  को महान अमेरिकी  कार्टूनिस्ट, लेखक और ड्रामा निर्देशक ली फ़ॉक ने एक ऐसे केरेक्टर को जन्म दिया जो मेरे जैसे करोड़ों दिलों  के बहुत करीब है ! जी हाँ ...आपने ठीक पहचाना मैं बात कर रहा हूँ फैंटम की !


The Phantom का जन्म...                                                               
                                                      Adventure comic strip के रूप में फैंटम का प्रकाशन एक दैनिक अखबार से शुरू हुआ ! बाद में 28 मई 1939 को color Sunday strip के रूप में इसका प्रकाशन शुरू हुआ !


जितनी भाषा उतने नाम... 
                                                        फैंटम के कई निक नेम है मसलन... "The Ghost Who Walks", The Man Who Cannot Die , Guardian of the Eastern Dark ! हिंदी में इसके संस्करण ''बेताल'' और  ''चलता- फिरता प्रेत'' के नाम से मशहूर हैं !


कुछ ख़ास है ...
                                                     फैंटम की  ख़ास बात यह है की अन्य सुपर हीरो की तरह इसके पास किसी तरह की  supernatural powers नहीं हैं ! उसके पास है तो बस एक तेज़ दिमाग , सुगठित और बेहद फुर्तीला शरीर, साहस और नेतृत्व क्षमता और दुनिया भर की अपडेट जानकारियाँ !


आदर्श भी है और आकर्षक भी...
                                                  फैंटम पर्यावरण और वनवासियों का रक्षक है !वन्य जीव उसके मित्र हैं और सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए वो सदैव तत्पर रहता है ! यानि   फैंटम आदर्श भी है और आकर्षक भी.... यही कारण है की दुनिया भर के पचास करोड़ से ज्यादा पाठक उसके दीवाने हैं !


विश्व व्यापी लोकप्रियता 
                                                    ली फ़ॉक ने १९९९ में आखिरी सांस लेने तक इस महान  केरेक्टर पर काम जारी रखा!आज कल इसे प्रकाशित करने का काम  Tony DePaul , Paul Ryan (Monday-Saturday) तथा  Terry Beatty (Sunday) जारी रखे हुयें हैं !दुनिया भर के पचास से ज्यादा देशों में फैंटम की comic books आज प्रकाशित हो रही हैं !


महान कर्मयोगी थे ...ली फ़ॉक 
                                                        फैंटम के फेंस में बच्चों से बुजुर्ग तक , महिलाएं ,पुरुष ,युवा , तरुण सभी शामिल हैं !Mandrake the Magician की सफलता के बाद प्रकाशकों के आग्रह पर एक नए केरेक्टर के रूप में  ली फ़ॉक ने  फैंटम की रचना की थी !13 मार्च 1999 को अपनी मर्त्यु से कुछ दिन पूर्व ली फ़ॉक ने अपना oxygen mask हटाकर फैंटम के एडवेंचर  dictate कराये  थे !ऐसे महान कर्मयोगी थे ली फ़ॉक !


भीष्म प्रतिज्ञा ....
                                                          २० साल के क्रिस्टोफर ने १५३६ की समुद्री यात्रा अपने पिता के साथ की थी इस जहाज़ को पायरेट्स ने रस्ते में लूटा और क्रिस्टोफर के पिता सहित सभी की हत्या पायरेट्स ने कर दी ! क्रिस्टोफर किसी तरह समुद्र में गिर गया... और बच गया ! समंदर के किनारे उसने अपने पूर्वजों की कसम खायी की... अपने पूरे जीवन को  मानवता ,सभ्यता और संस्कृति,  पर्यावरण और वनवासियों की रक्षा के लिए अर्पित कर देगा और उसके बाद उसके वंशज भी यही कार्य करेंगे !
"I swear to devote my life to the destruction of piracy, greed, cruelty, and injustice, in all their forms! My sons and their sons shall follow me.
                                                        The Phantom in 1536

आशियाना ...
                                                               फैंटम का निवास अफ्रीका में कहीं डेनकाली के जंगल हैं !कुछ देशों में विभिन्न संस्करण   इसे  Deep Woods of Bengali (originally "Bengalla", or "Bangalla" ) का नाम भी देते हैं !सभी वनवासी फैंटम को अपना रक्षक मानते हैं ...और उसके प्रति अटूट श्रद्धा भाव रखते हैं !


फैंटम की ख़ास पहचान...
                                                              फैंटम की ख़ास पहचान उसके दो चिन्ह हैं ..."The Good Mark", मित्रों और उनपर मिलता है जो फैंटम की सुरक्षा प्राप्त हैं... जबकि "The Evil Mark" or "Skull Mark" दुश्मनों की पिटाई करते समय फैंटम  उनके चेहरे पर जड़ देता है ! 


डेविल और हीरो ....
                                                                इनके बिना तो फैंटम की बात ही अधूरी है !ये फैंटम  के दो ख़ास सहायक हैं डेविल और हीरो ! ''डेविल''  भेड़िया  है जबकि ''हीरो'' घोडा ! फैंटम ने एक अनाथ '' रेक्स ''को पाला है और अनोखा  बाज़  फ्राका  भी उसका प्रशिक्षित है !


२१ वां फैंटम ....
                                                              किट वाकर २१ वां फैंटम  है ! मिसिसिपी में अपनी पढाई के दौरान वह डायना पामर से मिलता है ! 

 सीरियल और फ़िल्में बनी ....
                                                                 फैंटम पर विभिन्न देशों में विभिन्न सीरियल और फ़िल्में बनी हैं जिनमे १९९६ में पेरामौंट पिक्चर्स द्वारा बनी The Phantom प्रमुख है !विली जेन ने इसमें मुख्य भूमिका निभाई थी ! फैंटम काला मास्क और purple skintight bodysuit पहनता है ! वह दो   M1911 pistols धारण  करता  है ! 

"Fantomenland" की स्थापना - एक कड़वा सच ...                                                                   
                                                                    Swedish zoo  Eskilstuna में "Fantomenland" की स्थापना की गयी है ! इसका उद्घाटन स्वयं  ली फ़ॉक ने किया था पर दुर्भाग्य वश इसे वर्ष २००० में बंद कर दिया गया जानते हैं क्यों ?  क्यों की  अथोरिटी का मानना था की अब फैंटम बच्चों में उतना लोकप्रिय नहीं रह गया जितना पिछले दशक तक हुआ करता था !
                                                                   सच ही है टेलीविजन और इंटरनेट ने आज बच्चों को बच्चा रहने ही कहाँ दिया है ! क्या हमारी संस्कृति सभ्यता और कला की अमूल्य धरोहरों को बचाने के लिए हमारे पास कोई ठोस योजना है ? पर्यावरण, मानवता ,सभ्यता और संस्कृति के ऐसे अनोखे रक्षक की दुनिया को सदैव जरुरत है ! 

* * * * * PANKAJ K. SINGH